ग्रहण का वैज्ञानिक आधार
ग्रहण के समय जल, अन्न आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्र हो जाते हैं, जिससे वह दूषित हो जाता है, अतः जल आदि बर्तनों में कुशा डालकर रखना चाहिए, कुशा में कीटाणु एकत्र हो जाते हैं और ग्रहण के बाद उन कुशाओं को निकाल देना चाहिए, फिर स्नान के बाद ही भोजन करना चाहिए। ऐसा न करने से और ग्रहण के समय भोजन करने से यह सूक्ष्म जीवाणु भोजन के साथ पेट में चले जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। शोध द्वारा यह स्पष्ट है कि ग्रहण के समय व्यक्ति की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, अतःग्रहण के समय अजीर्ण जैसे रोगों की सम्भावनाऐं अधिक से अधिक रहती हैं, इसलिए ऋषि-महर्षियों ने बालक और रोगियों को छोड़कर सभी के लिए ग्रहण लगने के समय भोजन करने से मना किया है।
गर्भवती स्त्रियां रखें ध्यान
ग्रहण के समय गर्भवती स्त्रियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए क्योंकि गर्भस्थ शिशु के शरीर में ग्रहण के कारण विकार उत्पन्न होने की सम्भावनाऐं अधिक से अधिक होती हैं, ग्रहण के समय हानिकारक विकरणें अनवरत प्रवाहित होती रहती हैं, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय पराबैंगनी, गामा जैसी अन्य विकरणें निकलती हैं, सामान्य तौर पर ओजोन की परत उन्हें सोख कर आमजन तक नहीं पहुंचने देती, लेकिन ग्रहण काल में ये विकरणें गर्भ में पल रहे कोमल शिशु के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं।
ग्रहण योग
चन्द्रमा मन का कारक होता है, जब कभी राहु के द्वारा ग्रहण योग बने तो ऐसे समय उत्पन्न होने वाले बालक जीवन में अशान्ति का अनुभव करता है, स्वयं निर्णय लेने में कठिनाइयां आती हैं। मानसिक अस्थिरता और ग्रहण दोष से बचने के लिए सफेद चीजें, चीनी, चावल, दही आदि का दान करना चाहिए। चन्द्रमा के मंत्रों का जप करने से चन्द्रमा बलवान होता है, ग्रहण के बाद ऐसे बालकों को पूर्णिमा के दिन चांदी से निर्मित अर्द्धचन्द्रमा चन्द्रमा के मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित कर गले में धारण कराना चाहिए।













