दरअसल, दिल्ली हाईकोर्ट में एक शख्स याचिका लेकर पहुंचा। उसने कोर्ट को बताया कि जब उसकी पत्नी बिना तलाक दिए उसे छोड़कर चली गई तो उसने 1983 में दूसरी महिला के साथ रहना शुरू कर दिया। उनके रिश्ते से दो बच्चे भी हुए। 1990 में दूसरी महिला के साथ रहने के कारण पत्नी और बेटी की उपेक्षा का आरोप लगा। डिपार्टमेंटल कार्रवाई हुई और शख्स को 4 साल के लिए 4 स्टेज तक सैलरी में कटौती की सजा मिली।
रोक दी थी 50% पेंशन और ग्रेच्युटी
रिटायरमेंट से पहले साल 2011 में याचिकाकर्ता के खिलाफ पार्टनर और बच्चों के लिए डिप्लोमैटिक पासपोर्ट अप्लाई करते समय गलतबयानी का आरोप लगा। जांच शुरू हुई, जिसके कारण उनकी मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी बेनिफिट्स का 50% रोकने की पेनल्टी लगाई गई। लेकिन अब दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र से इस मामले पर विचार करने के लिए कहा है। शख्स ने हाई कोर्ट से मांग की है कि उसकी Live-In पार्टनर और उनके बच्चों के नाम फैमिली पेंशन और हेल्थकेयर सुविधाओं के लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर में शामिल किए जाएं।
शख्स ने कभी रिश्ता नहीं छुपाया
मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस नवीन चावला और मधु जैन की बेंच ने कहा कि रिटायर्ड कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया। उसके पार्टनर और बच्चों के नाम को परिवार में शामिल करने की कोशिश को गलत मानकर रिटायरमेंट के बाद के फायदे न देना गलत है। यह कहते हुए बेंच ने 2018 के सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अधिकारी के मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी बेनिफिट्स का 50% रोकने के फैसले को सही ठहराया गया था।
पेंशन से इनकार की कोई वजह नहीं
दरअसल, 2018 में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के आदेश ने 2012 में रिटायर हुए कर्मचारियों को दी जाने वाली मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी बेनिफिट्स का 50% रोकने के अथॉरिटी के फैसले को सही ठहराया था। इस पर दिल्ली HC ने कहा कि हमें प्रतिवादियों के पास याचिकाकर्ता की मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी का 50% स्थायी रूप से रोकने का वैध कारण नहीं मिला। वहीं, याचिकाकर्ता के आश्रितों को फैमिली पेंशन देने से इनकार करने की भी कोई वजह नहीं है। इसलिए याचिकाकर्ता को पूरी राशि और पेमेंट में देरी पर 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी दिया जाए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारी विभाग को फैमिली पेंशन और CGHS सुविधाओं के लिए पेंशन पेमेंट ऑर्डर में पार्टनर और उसके बच्चों का नाम शामिल करने की याचिकाकर्ता की अपील पर भी विचार करना चाहिए।













