यह निर्देश जस्टिस हसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने उन अपीलों की सुनवाई के दौरान दिए हैं, जिनमें स्वर्णप्रीत कौर समेत कई होमबायर्स ने डीएलएफ होम डेवलपर्स लिमिटेड के खिलाफ दायर किया था। ये अपीलें राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के आदेश से संबंधित हैं।
CBI जांच के आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, पूरे मामले में सीबीआई निदेशक एक विशेष टीम का गठन करें और सभी संबंधित व्यक्ति सीबीआई जांच की सहायता करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीबीआई टीम स्वतंत्र रूप से कोर्ट के अधिकारियों के रूप में काम करेगी।
कोर्ट ने CBI को 25 अप्रैल 2026 तक जांच की प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल 2026 को दोपहर 2 बजे होगी।
यह अकेला मामला नहीं हो सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि, शायद यह हिमबर्ग का एक छोटा सा हिस्सा है। हमें यह मानना काफी मुश्किल है कि यह सिर्फ एक इकलौती घटना है। हम इसलिए अधिक चिंतित हैं क्योंकि यदि संगठित रियल एस्टेट क्षेत्र में ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो आम उपभोक्ताओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्या है DLF का हाउसिंग विवाद?
- यह मामला गुरुग्राम के सेक्टर 82ए में एक सामूहिक आवास परियोजना के विकास से संबंधित है।
- मई 2012 में डीएलएफ ने इस परियोजना को प्रीमियम रिहायशी कॉम्प्लेक्स के रूप में प्रचारित किया था।
- प्रचार अभियान में दो 24 मीटर चौड़ी सेक्टर एक्सेस सड़कों को प्रमुख विशेषता बताया गया था।
- इन आश्वासनों के आधार पर खरीदारों ने 2012 में फ्लैट बुक किए। हालांकि, परियोजना तय समय पर पूरी नहीं हुई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 7 अक्टूबर, 2016 को आंशिक अधिभोग प्रमाण पत्र (पीओसी) जारी होने के बावजूद, स्थायी पानी और बिजली कनेक्शन नहीं थे और बुनियादी ढांचा अधूरा ही रहा। यहां तक कि फ्लैट्स तक जाने का रास्ता तक नहीं बना था।
- इसके बाद, 2017 में कई खरीदारों ने NCDRC से संपर्क किया। आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सेवा में कमी और अनुचित व्यापार प्रथाओं के निष्कर्ष दर्ज किए।
- इसके बाद, घर खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और आरोप लगाया कि डेवलपर NCDRC के निर्देशों का पालन करने में विफल रहा है।
DLF पर क्या है आरोप?
होमबायर्स का कहना है कि 2016 में POC जारी होने के बावजूद स्थायी पानी और बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं थे और बुनियादी ढांचा अधूरा रहा। बाद में खरीदार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, आरोप लगाते हुए कि डेवलपर ने आयोग के निर्देशों का पालन नहीं किया।














