नाजुक दौर से गुजर रहा कांग्रेस-डीएमके का गठबंधन
तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन फिलहाल अपने सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। खबरों के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान ने राज्य इकाई को गठबंधन धर्म का पालन करने और अपने पुराने सहयोगी के खिलाफ बयानबाजी से बचने की नसीहत दी है, लेकिन राज्य के नेताओं में डीएमके द्वारा सत्ता में हिस्सेदारी न देने को लेकर गहरी नाराजगी है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने इस मुद्दे पर डीएमके को आड़े हाथों लेते हुए केरल के ‘यूडीएफ मॉडल’ का उदाहरण दिया है। टैगोर ने कहा कि चुनाव के बाद सहयोगियों को ‘टाटा-बाय-बाय’ कहना गठबंधन धर्म नहीं है। उन्होंने डीएमके के रवैये को ‘केंद्रीकृत मानसिकता’ करार दिया, जबकि डीएमके ने अभी तक कांग्रेस के इस आक्रामक रुख पर चुप्पी साध रखी है।
विजय की रैली की भीड़ कांग्रेस को लुभा रही
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस के लिए यह फैसला दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक तरफ डीएमके छोड़ने के अपने फायदे हैं, क्योंकि कांग्रेस को वहां सरकार में शामिल होने का मौका नहीं मिलता और डीएमके के विवादित बयानों का नुकसान कांग्रेस को उत्तर भारत में उठाना पड़ता है। ऐसे में विजय की टीवीके, जिसने कांग्रेस को ‘स्वाभाविक सहयोगी’ बताया है, एक नया विकल्प हो सकती है। विजय की रैलियों में उमड़ रही भीड़ और सत्ता में भागीदारी की संभावना कांग्रेस को लुभा रही है। साथ ही, बीजेपी के बढ़ते प्रभाव और डीएमके के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर से बचने के लिए भी यह बदलाव फायदेमंद लग सकता है।
बदलाव में भारी जोखिम भी छिपा!
दूसरी तरफ, इस बदलाव में भारी जोखिम भी छिपा है। डीएमके एक परखा हुआ और मजबूत साथी है, जिसने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाने में मदद की है। कांग्रेस का अपना संगठन राज्य में कमजोर है और उसका वोट शेयर लगातार गिर रहा है। वहीं, अभिनेता विजय राजनीति में अभी नौसिखिए हैं और उनकी रैलियों की भीड़ वोटों में बदलेगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है। अगर विजय का जादू नहीं चला, तो कांग्रेस अपना एक स्थिर और वफादार साथी खो देगी और राज्य की राजनीति में पूरी तरह अलग-थलग पड़ सकती है। अब देखना यह होगा कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता में हिस्सेदारी के लालच में जोखिम उठाता है या सुरक्षित रास्ते पर चलते हुए पुराने साथी के साथ ही बना रहता है।













