डीएमके के साथ गठबंधन में समस्या क्या है?
कांग्रेस सांसद मणिक्कम टैगोर ने हाल ही में सबसे पहले पावर शेयरिंग का आइडिया दिया। उन्होंने कहा कि DMK के साथ राज्य में सत्ता बांटने पर चर्चा करने का समय आ गया है। जब DMK ने इसके लिए ‘ना’ कहा, तो कांग्रेस नेता ने क्षेत्रीय सहयोगी पर निशाना साधा। साथ ही, उस पर गठबंधन सहयोगियों के प्रति असहिष्णुता का आरोप भी लगाया। इस पूरे मामले को लेकर जानकारों का मानना है कि तमिलनाडु में कांग्रेस की दुविधा अब बराबर का पार्टनर बनने को लेकर नहीं है; बल्कि यह है कि क्या वह जूनियर सहयोगी बनना बंद कर सकती है या नहीं।
तमिलनाडु में कांग्रेस आखिरी बार 1967 में सत्ता में थी। इसके बाद लगभग 58 से 60 वर्षों से कांग्रेस यहां गठबंधन के जरिए ही शासन का हिस्सा रही है। कांग्रेस आलाकमान ने डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन से बाहर निकलने की बात बंद कर दी है। इसके पीछे सीधा सा तर्क है कि तमिलनाडु उन कुछ राज्यों में से एक है जहां कांग्रेस अभी भी गठबंधन को जीत में बदल पाती है। इसके अलावा गठबंधन टूटने से 2026 के विधानसभा चुनावों और 2029 में उसके भविष्य दोनों को नुकसान होगा।
तमिलनाडु में कांग्रेस का इतिहास
1950 के दशक में राज्य में प्रारंभिक शिक्षा के मुद्दे को लेकर द्रविड़ और कांग्रेस की राजनीतिक का स्वरूप बदलना शुरू हो गया था। इसके बाद संविधान का सोलहवा संशोधन हुआ। उसी समय कांग्रेस में फूट पड़ गई। इसके बाद से डीएमके राज्य में मजबूत होने लगी। इसके बाद 1971 में इंदिरा गांधी और डीएमके के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत डीएमके ने राज्य में अपना दबदबा मजबूत बनाए रखना चुना। वहीं, संसदीय चुनाव में कांग्रेस को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी थी।
समय के साथ राज्य में एमजी रामचंद्रन, AIADMK का उदय हुआ। इससे कांग्रेस के लिए राज्य में जनाधार सिमटने लगा। स्थिति यह हुई कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में नेता तो बनते रहे लेकिन राज्य स्तर पर पार्टी कमजोर होती चली गई। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और कैडर में कमी होती गई। 1996 में पार्टी के वरिष्ठ नेता जीके मूपनार ने बगावत कर नई पार्टी तमिल मानिला कांग्रेस बना ली। इससे पार्टी में फूट और गुटबाजी साफ नजर आने लगी।
1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत तक, उथल-पुथल के बावजूद एक स्थिर पैटर्न बन गया था। विधानसभा चुनावों में, कांग्रेस ने छोटा रोल स्वीकार किया। वहीं, लोकसभा चुनावों में, उसने बेहतर हिस्सेदारी के लिए मोलभाव किया। DMK ने, अपनी तरफ से, विपक्षी एकता के प्रतीक के तौर पर संसदीय चुनावों में कांग्रेस को साथ रखना अक्सर फायदेमंद पाया, भले ही राज्य-स्तर की सत्ता द्रविड़ियन दो-ध्रुवीय सिस्टम के अंदर ही केंद्रित रही। इस गणित ने कांग्रेस को बार-बार फायदा ही पहुंचाया।
कांग्रेस के लिए क्या है विकल्प?
दक्षिण की राजनीतिक के जानकार और ‘द द्रविड़ियन पाथवे’ के लेखक विग्नेश कार्तिक के आर के अनुसार कांग्रेस, बेशक, अकेले दम पर फिर से खड़ा होने की कोशिश कर सकती है। लेकिन इसके लिए सालों तक कैडर पर काम करने, लोकल बॉडी ऑर्गनाइज़ेशन और लीडरशिप तैयार करने की ज़रूरत होगी। तब तक, DMK गठबंधन से बाहर निकलना आज़ादी की घोषणा से अधिक खुद को नुकसान पहुंचाने जैसा होगा।
विग्नेश ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में बताया कि कांग्रेस के डीएमके के साथ वाले गठबंधन से निकलने से बड़े विपक्षी माहौल को कमजोर किया जाएगा। इसमें बीजेपी विरोधी एकजुटता डीएमके के नेतृत्व वाले एक जाने-पहचाने सेक्युलर प्लेटफॉर्म पर टिकी है। कांग्रेस के लिए अधिक प्रैक्टिकल सबक यह है कि वह अहम राज्यों में नेतृत्व करना सीखे, एक सूत्रधार की तरह काम करे जो ऊपर से नीचे तक एक ही मॉडल थोपने के बजाय जीतने लायक और मजबूत गठबंधनों को प्राथमिकता दे।













