जब सदन में हुआ रूल 349 का जिक्र
इस दौरान लोकसभा में संसदीय कार्यवाही को लेकर रूल 349 का जिक्र सामने आया। यही नहीं गृह मंत्री अमित शाह ने दो और नियमों का हवाला दिया। उन्होंने रूल 349 के अलावा रूल 358 और रूल 389 के तहत संसदीय कार्यवाही के नियम नहीं मानने को लेकर नेता प्रतिपक्ष पर कार्रवाई की मांग कर दी। क्या हैं रूल 349 समेत तीनों नियम, जानिए।
नियम 349 की चर्चा क्यों?
सबसे पहले बात संसदीय कार्यवाही के रूल नंबर 349 की। ये रूल सांसदों के लिए सदन में बहस के दौरान उनकी ओर से कही जाने वाली बातों और प्रक्रियाओं के बारे में बताता है। इस नियम के क्लॉज (i) में साफ-साफ लिखा है कि ‘कोई भी सदस्य सदन के कामकाज से जुड़े मामले के अलावा कोई किताब, अखबार या चिट्ठी नहीं पढ़ेगा।’
इस नियम के मुताबिक, सांसद किसी बाहरी चीज का जिक्र ऐसे ही नहीं कर सकते, जब तक कि वह सीधे तौर पर चल रही चर्चा से जुड़ी न हो और संसदीय परंपराओं के हिसाब से ठीक न मानी जाए। इस नियम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सदन में ऐसी बातें न कही जाएं जिनकी पुष्टि न हुई हो, या जो निजी प्रकाशन या राजनीतिक रूप से संवेदनशील सामग्री से जुड़ी हों जिन्हें औपचारिक रूप से सदन में पेश नहीं किया गया हो।
क्या है रूल 349
- रूल 349, संसदीय कार्यवाही में सदस्यों की ओर से पालन किए जाने वाले नियम हैं।
- यह नियम संसद सदस्यों के लिए आचार संहिता बताता है, जब सदन चल रहा हो ताकि मर्यादा और व्यवस्था बनी रहे।
- इसके मुख्य प्रावधानों पर गौर करें तो सदस्यों को ऐसी किताबें, अखबार या पत्र पढ़ने की मनाही है, जो सीधे सदन के काम से जुड़े नहीं हों।
- इसमें अपनी बात रख रहे सांसद स्पीकर से बातचीत करेंगे। सदस्यों को सदन में प्रवेश करते या निकलते समय सीट पर बैठते या उठते समय स्पीकर की परमिशन जरूरी है।
रूल 358 क्या है , जिसका जिक्र अमित शाह ने किया
- ये रूल संसदीय कार्यवाही के दौरान भाषणों का क्रम और जवाब देने का अधिकार देता है।
- यह नियम किसी प्रस्ताव, संकल्प या विधेयक पर बोलने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
- प्रस्ताव रखने वाले के बोलने के बाद, अन्य सदस्य स्पीकर की ओर से तय किए गए क्रम में ही बोल सकते हैं।
- कोई भी सदस्य किसी प्रस्ताव पर एक से अधिक बार नहीं बोल सकता, सिवाय जवाब देने के अधिकार के या स्पीकर की अनुमति से।
जानिए रूल 389 क्या है
- यह नियम लोकसभा के स्पीकर को उन स्थितियों को संभालने का अधिकार देता है जो मौजूदा नियमों में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं।
- स्पीकर सभी मामले जो नियमों में विशेष रूप से प्रदान नहीं किए गए हैं, और इन नियमों के विस्तृत कामकाज से संबंधित सभी प्रश्न, स्पीकर की ओर से तय किए जाते हैं।
- स्पीकर समय-समय पर सदन की कार्यवाही को विनियमित करने के लिए निर्देश जारी कर सकते हैं।
राहुल गांधी पर क्यों लागू हुआ रूल 349
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम एम नरवणे की अनपब्लिश्ड बुक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का जिक्र किया। इसी के कुछ अंश उन्होंने सदन में पढ़ने की कोशिश की, जिसके लिए उन्हें रोका गया। फिर राहुल गांधी ने इस किताब पर आधारित एक मैगजिन में छपे लेख का जिक्र लोकसभा में किया। सत्ता पक्ष के सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि अप्रकाशित किताब से पढ़ना संसदीय नियमों के खिलाफ है।
स्पीकर ओम बिरला ने क्या कहा
इसी के बाद स्पीकर ओम बिड़ला ने नियम 349(i) का हवाला देते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को निर्देश दिया कि जब तक किताब प्रमाणित न हो जाए या औपचारिक रूप से सदन में पेश न हो जाए, तब तक वे उस अंश को नहीं पढ़ें। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा कि अनपब्लिश्ड सामग्री का हवाला नहीं दिया जा सकता। वहीं, विपक्ष का तर्क था कि पिछली बहसों में मैगजीन के लेख और बाहरी सोर्स का जिक्र अक्सर होता रहा है।
क्या रूल 349 किताब-अखबारों के कोट पर रोक लगाता है?
क्या संसदीय कार्यवाही का रूल नंबर 349 किताबों और अखबारों के कोट पर रोक लगाता है? जानकारों के मुताबिक, ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह नियम किताबों और अखबारों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी नहीं लगाता। सदस्य किताबों, रिपोर्टों या अखबारों का जिक्र कर सकते हैं, बशर्ते वह सामग्री चर्चा के विषय से साफ तौर पर जुड़ी हो और विशेषाधिकार, राष्ट्रीय सुरक्षा या स्थापित संसदीय परंपराओं का उल्लंघन न करती हो। पूरे मामले में सदन के स्पीकर ही तय करते हैं कि किसी जिक्र को स्वीकार किया जाए या नहीं।
नियम 349 क्यों महत्वपूर्ण है?
रूल 349 आमतौर पर हर किसी की नजर में नहीं रहता, लेकिन इस तरह की घटनाएं संसदीय कार्यवाही में व्यवस्था में अहम रोल निभाती हैं। ये सदन की सच्चाई और गरिमा बनाए रखने में इसके महत्व को उजागर करती हैं। यह स्पीकर को यह तय करने का विवेकाधिकार देती है कि सदन में किस सामग्री का जिक्र किया जा सकता है। खासकर जब राष्ट्रीय सुरक्षा, अनपब्लिश्ड दस्तावेज या राजनीतिक रूप से संवेदनशील सोर्स शामिल हों। यह नियम सुनिश्चित करता है कि सदन केवल सत्यापित और प्रासंगिक जानकारी पर चर्चा करे।













