कब आपसी समझौते से केस ले सकते हैं वापस ?
- समझौता वाले केस यानी कंपाउंडेबल ऑफेस के मामले में ही आपसी समझौते के आधार पर केस वापस लिया जा सकता है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-359 और पहले की सीआरपीसी की धारा-320 में एक चार्ट दिया गया है जिसमे समझौतावादी केसो के बारे में डिटेल बताया गया है। इन मामलो में शिकायती चाहे तो केस वापस ले सकता है।
- मौटे तौर पर 3 साल तक कैद की सजा के मामले कुछ अपवादों को छोड़कर समझौतावादी अपराध होते हैं और ऐसा केस शिकायती और आरोपी के बीच समझौता होने पर वापस लिए जा सकते हैं।
- आपराधिक मानहानि, रास्ता रोकने और मारपीट आदि से जुड़े मामले मामूली किस्म के अपराधों की कैटिगरी में आते है। अगर शिकायती और आरोपी के बीच कोर्ट के बाहर समझौता हो जाए तो निचली अदालत के सामने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा-359 के तहत अर्जी दाखिल होती है। वे समझौते की बात कहते हुए केस वापस लेने और केस रद्द की गुहार लगाते हैं।
- इसके बाद अदालत के सामने दोनो पक्ष पेश होते हैं। कोर्ट को बताया जाता है कि बिना किसी दबाव के, आपसी सहमति से केस खत्म करने की रजामंदी हुई है। ऐसे में केस रद्द किया जाए। इसके बाद अगर अदालत संतुष्ट हो तो केस रद्द करने का आदेश देती है।
कब केस वापसी में हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी ?
- गैर समझौतावादी केस (नॉन कंपाउंडेबल ऑफिस) समझौते के आधार पर वापस नहीं लिया जा सकता है यानी शिकायती की रजामंदी भी हो तो भी समझौते के आधार पर अपनी मर्जी से केस वापस नहीं लिया जा सकता है।
- कुछ ऐसे मामले जो गैर समझौतावादी हैं, लेकिन फिर भी अगर दोनो पक्षो में समझौता हो जाए तो फिर केस रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई जाती है। तब संवैधानिक अदालते (हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) केस रद्द करने का आदेश पारित करती है।
- गैर इरादतन हत्या की कोशिश, जालसाजी और दहेज प्रताड़ना जैसे गैर समझौतावादी मामलो मे अगर समझौता हो जाए तो फिर ये केस हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से रद्द किए जाते हैं। जब संवैधानिक अदालत दोनो पक्षों की दलील से संतुष्ट होती है, तभी केस रद्द होता है। संतुष्ट न होने पर अर्जी खारिज हो सकती है।
मर्डर और रेप जैसे केस रद्द नहीं होते
मर्डर, रेप, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, ड्रग्स और महिलाओं के खिलाफ किए गए गंभीर अपराध जैसे बेहद गंभीर मामलो में समझौते के आधार पर केस खारिज नहीं होता है। साल 2012 में ज्ञान सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस मे सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि रेप, डकैती और मर्डर के केस में समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं हो सकता।













