सिब्बल ने मेलोनी के बयान को एक्स पर शेयर किया है। इसमें मेलोनी कह रही हैं कि ग्रीनलैंड में यूरोपीय नाटो सैनिकों की तैनाती अमेरिका विरोधी नहीं है। इसके बारे में ठीक से बताया नहीं गया, जिससे अमेरिका को गलतफहमी हुई। नाटो कोऑर्डिनेशन को ठीक किया जाना चाहिए। सिबल ने कहा कि मेलोनी के बयान से लगता है कि वह चीजों को टालने की कोशिश कर रही हैं।
यूरोप डरा तो मुश्किल में फंसेगा
सिब्बल ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘जॉर्जिया मेलोनी इस मुद्दे पर गोलमोल बातें कर रही हैं। आखिर रूस और चीन से ग्रीनलैंड की क्षेत्रीय स्थिति को क्या खतरा है। वह दावा कर रही हैं कि कुछ यूरोपीय देशों की थोड़ी-बहुत मिलिट्री तैनाती रूस और चीन के खतरे को रोकने के लिए है। यह अमेरिका के खिलाफ कोई मैसेज नहीं है। यह बेईमानी वाली बात क्यों कही जा रही है।’
सिब्बल ने आगे कहा कि मेलोनी की ओर से ट्रंप के साथ टकराव से बचने की कोशिश हो रही है। लेकिन किसी समस्या से भागने का मतलब यह नहीं है कि समस्या आपसे दूर चली जाएगी। यूरोप अपने अस्तित्व पर आई इस चुनौती से पीछे हटता है और टालमटोल की कोशिश करता है तो ट्रंप को दूसरे मतभेदों वाले मुद्दों पर उसके खिलाफ टैरिफ हथियार का इस्तेमाल करने को बढ़ावा मिलेगा।
टैरिफ की धमकी से बढ़ा विवाद
डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी लंबे समय से दी जा रही है। हालिया तनाव की वजह उनका टैरिफ हमला है। ग्रीनलैंड पर साथ ना देने के लिए उन्होंने यूरोपीय देशों के खिलाफ टैरिफ लगाए हैं। यूरोप के देशों ने इसे अमेरिका की ब्लैकमेल करने की कोशिश कहा है। यूरोप में अमेरिका के इस रुख पर काफी ज्यादा गुस्सा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और यूके पर नए टैरिफ लगाने का ऐलान किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ये देश ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कब्जे के प्लान का विरोध करते हैं। ऐसे में इन देशों पर 1 फरवरी से फरवरी से नए टैक्स लगाएंगे। ट्रंप ने जून में इस टैरिफ को और बढ़ाने की धमकी दी है।














