फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के समय को धर्मशास्त्रों में होलाष्टक का नाम दिया गया है। ज्योतिष के ग्रन्थों में ‘होलाष्टक’ के आठ दिन समस्त मांगलिक कार्यों में निषिद्ध कहे गए हैं। ‘होलाष्टक’ दो शब्दों से मिलकर बना है, होला और अष्टक, अष्टक अर्थात् आठ इसलिए होली जलने से आठ दिन पूर्व होलाष्टक में शुभ कर्म नहीं किए जाते, न ही कोई मांगलिक कार्य होता है, कोई नई वस्तु नहीं खरीदी जाती।
होलाष्टक की कैसे हुई थी शुरूआत?
होलाष्टक के मध्य दिनों में सोलह संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता, यहां तक कि अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शांति कार्य किए जाते हैं। इन दिनों में सोलह संस्कारों पर रोक होने के कारण इस अवधि को शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ नहीं माना जाता। होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोले नाथ ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरूआत हुई थी। होली की शुरूआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलहण्ड़ी तक रहती है, इसके कारण इन दिनों प्रकृति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है।
क्यों मनाया जाता है होलाष्टक?
होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही उस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरम्भ हो जाता है। सर्दियां अलविदा कहने लगती हैं और गर्मियों का आगमन होने लगता है। भगवान श्री कृष्ण आठ दिन तक गोपियों संग होली खेले और दुलहण्डी के दिन अर्थात् होली को रंगों में सन कपड़ों को अग्नि के हवाले कर दिया, तब से आठ दिन तक यह पर्व मनाया जाने लगा।













