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  • India-China Vs US: ट्रंप की हिटलरी निकल जाएगी, भारत-चीन के पास है अमेरिका की अकड़ ढीली करने का नुस्खा

    नई दिल्ली: अमेरिका की दादागीरी दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी वो ग्रीनलैंड पर कब्जे करने की धमकी दे रहा है तो कभी ईरान पर हमला करने की बात कह रहा है। कभी रूस से तेल खरीदने वाले भारत-चीन पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप


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    By Azad Hind Desk जनवरी 15, 2026
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    नई दिल्ली: अमेरिका की दादागीरी दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। कभी वो ग्रीनलैंड पर कब्जे करने की धमकी दे रहा है तो कभी ईरान पर हमला करने की बात कह रहा है। कभी रूस से तेल खरीदने वाले भारत-चीन पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में कुछ ज्यादा ही अहंकारी और बिगड़े तेवर वाले बनकर उभरे हैं। हालांकि, सीधे तौर पर सैन्य संघर्ष की संभावना कम है, लेकिन काल्पनिक तौर पर ये देश अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों की बड़े पैमाने पर समन्वित बिक्री करते हैं। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंच सकता है, जो संभावित रूप से खरबों डॉलर तक होगा। अगर भारत-चीन का गठजोड़ बन जाए तो अमेरिका की सारी हेकड़ी निकल जाएगी।

    2026 में अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण का पैमाना

    9 जनवरी, 2026 तक, अमेरिका का सकल राष्ट्रीय ऋण लगभग 38.43 ट्रिलियन डॉलर है। इसमें जनता पर करीब 30.80 ट्रिलियन डॉलर का ऋण और अंतर-सरकारी संपत्तियों में 7.63 ट्रिलियन डॉलर शामिल हैं। कर्ज लेने में तेजी आई है। 2025 में ही कुल कर्ज लगभग 2.25 ट्रिलियन डॉलर बढ़ गया है, जो औसतन प्रतिदिन 8 बिलियन डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी के बराबर है। प्रति व्यक्ति आधार पर देखा जाए तो यह हर अमेरिकी नागरिक के लिए लगभग 115,000 डॉलर के बराबर है।

    ब्याज भुगतान के बोझ तले दबा है अमेरिका

    टाइम्स नाऊ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ब्याज भुगतान पहले से ही संघीय वित्त पर दबाव डाल रहे हैं। 2025 की अंतिम तिमाही में शुद्ध ब्याज लागत 276 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई, जो ज्यादा ब्याज दरों और बढ़ते ऋण भंडार के कारण पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है। अमेरिका इस बोझ की भरपाई मुख्य रूप से ट्रेजरी बिल, नोट और बॉन्ड के माध्यम से करता है, जिन्हें डॉलर की आरक्षित मुद्रा स्थिति के कारण लंबे समय से दुनिया की सबसे सुरक्षित संपत्तियों में गिना जाता है। हालांकि, विदेशी खरीदारों पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक कमजोरियों को भी जन्म देती है।

    अमेरिका की समस्या क्या है

    विदेशी निवेशक सामूहिक रूप से लगभग 8.5 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों के धारक हैं, जो अमेरिकी उधार का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह स्थिर मांग अमेरिकी ब्याज दरों को सामान्य से कम रखने में मदद करती है, जिससे वाशिंगटन अपेक्षाकृत कम लागत पर घाटे, बुनियादी ढांचे पर खर्च और सैन्य अभियानों को वित्त पोषित कर पाता है।

    चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए अहम

    धारक देशों के लिए ट्रेजरी प्रतिभूतियां मूल्य के सुरक्षित भंडार, मुद्राओं के स्थिरीकरण और विदेशी मुद्रा भंडार के एक प्रमुख घटक के रूप में कार्य करती हैं। दूसरा सबसे बड़ा विदेशी धारक चीन, लगभग 759 बिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिभूतियों का मालिक है। हालांकि इसकी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम हुई है, फिर भी यह रेनमिनबी की विनिमय दर को नियंत्रित करने और चीन की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था को सहारा देने में केंद्रीय भूमिका निभाती है। व्यापार अधिशेष को अमेरिकी ऋण में पुनर्चक्रित करके, चीन लाभ अर्जित करता है और अप्रत्यक्ष रूप से अपने निर्यात की मांग को भी बढ़ावा देता है।

    भारत-चीन के संबंधों में आ रहा सुधार, QUAD को खतरा

    THE DIPLOMAT पर छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, देशों के बीच संबंध नाजुक हो सकते हैं। आंतरिक और बाहरी कारकों हितों और मजबूरियों के आधार पर बिगड़े हुए संबंध पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारी में बदल सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, भविष्य के लिए आशाजनक सौहार्दपूर्ण संबंध भी बिगड़ सकते हैं। भारत परिवर्तन और पुनर्संतुलन के ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने 50 प्रतिशत टैरिफ लगाकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामक विदेश नीति के जवाब में भारत में अपनी रुचि कम कर दी है, जिससे QUAD (क्वाड) को खतरा पैदा हो गया है।

    रूस-चीन-भारत का नया गठबंधन अवसर

    द डिप्लोमैट पर छपे एक लेख में कहा गया है कि ट्रंप की टैरिफ नीति से आहत चीन न केवल भारत के साथ संबंध सुधारने का अवसर देख रहा है, बल्कि बीजिंग-मॉस्को-नई दिल्ली गठबंधन बनाने का भी प्रयास कर रहा है। चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग शिखर सम्मेलन के दौरान भी ये तीनों ही देश करीब आते देखे गए। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर तियानजिन से वायरल हो गई थी, जिसे लेकर ट्रंप काफी असहज हो गए थे। क्वॉड के आगे भारत-रूस और चीन यानी RIC का गठबंधन बन सकता है। हालांकि, आने वाले समय में वाशिंगटन को शायद अपनी गलती का एहसास होगा और अपना रुख बदलेगा।

    भारत-चीन संबंधों में सुधार में आ रही तेजी

    बीते साल जब से मोदी और शी जिनपिंग कजान में मिले थे, द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी है। चीन की ओर से कुछ रियायतें दी गईं, जिनमें तिब्बत में एक हिंदू तीर्थस्थल की धार्मिक यात्रा फिर से शुरू करने की अनुमति देना शामिल है, जिससे नई दिल्ली की भाजपा सरकार बेहद खुश हुई है। इसके जवाब में, भारत ने चीनी नागरिकों के लिए वीजा नियमों में ढील दी है। लोगों के बीच और विचारकों के बीच संपर्क बढ़ाने के कदम उठाए जा रहे हैं। विशेष प्रतिनिधि तंत्र के माध्यम से सीमा विवाद को सुलझाने के लिए उच्च स्तरीय वार्ता फिर से शुरू हो गई है।

    क्वॉड बनाम चीन को संतुलित कर रहा भारत

    भारत-चीन बनाम अमेरिका का संबंध एक जटिल भू-राजनीतिक त्रिकोण है, जिसमें अमेरिका भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को गहरा करके (जैसे कि चतुर्भुज QUAD के माध्यम से चीन की बढ़ती शक्ति को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है। क्वॉड में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत हैं। वहीं, चीन भारत पर अमेरिका के साथ सहयोग सीमित करने का दबाव डाल रहा है। इससे व्यापार और भू-राजनीतिक तनाव पैदा हो रहे हैं, जहां भारत बीच में फंसा हुआ है और उसे चीन पर आर्थिक निर्भरता और अमेरिका के साथ रणनीतिक संरेखण के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। आर्थिक रूप से, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन भारत अभी भी प्रमुख घटकों के लिए चीन पर निर्भर है, जिससे उसके संबंध जटिल हो जाते हैं।

    चीन और अमेरिका के बीच है भारत

    भारत रणनीतिक स्वायत्तता का लक्ष्य रखता है, अमेरिका के साथ अपनी बढ़ती साझेदारी और अपने महत्वपूर्ण आर्थिक संबंधों और ऐतिहासिक गुटनिरपेक्षता के बीच संतुलन बनाए रखता है। साथ ही चीन के साथ सीमा विवादों से भी निपटता है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जिसके साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार और भारत का व्यापार अधिशेष है। वहीं, भारत महत्वपूर्ण घटकों (जैसे सौर पैनल के पुर्जे) के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद कुछ कमजोरियां पैदा होती हैं।

    चीन ने ऐसे की अमेरिका की हालत पस्त

    चीन के पास दुनिया के रेयर अर्थ प्रोडॅक्शन के करीब 90 फीसदी हिस्से पर कब्जा है। उसने अमेरिका को रेयर अर्थ की सप्लाई भी बेहद रिस्ट्रिक्ट कर दी है। तकनीक के मामले में भी चीन अमेरिका से कुछ मामलों में बहुत आगे है। इसके अलावा, चीन अब तक अमेरिका के सोयाबीन और मक्के का बहुत बड़ा खरीददार रहा है। मगर, इस बार चीन ने अमेरिका से इन चीजों को लेना बंद कर दिया, जिससे पूरे अमेरिका में मक्का और सोयाबीन उत्पादकों के बीच हाहाकार मचा हुआ है। ऐसे में अमेरिका अब भारत जैसे दूसरे देशों पर इसे लेने का दबाव डाल रहा है।

    BRICS से भी अमेरिका डरा हुआ है

    भारत 1 जनवरी से भारत, रूस, ब्राजील, चीन और दक्षिण अफ्रीका के संघ वाले BRICS का अध्यक्ष बन गया है। भारत-रूस और चीन ने ब्रिक्स देशों को डॉलर के अलावा अपनी लोकल करेंसी में कारोबार करने की अनुमति दी है। भारत ने भी ब्रिक्स देशों को रुपये में लेन-देन की अनुमति बीते साल ही दे दी है। करीब 300 करोड़ की आबादी वाले ब्रिक्स देशों के पास 77 ट्रिलियन डॉलर के साथ दुनिया की करीब 35-40 फीसदी जीडीपी है। हालांकि, अमेरिका ब्रिक्स से बहुत खुश नहीं है। खुद ट्रंप ब्रिक्स को बेकार बता चुके हैं।

    भारत की अहमियत जानकर अमेरिका दे रहा ये लालच

    हाल ही में भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने अपना पदभार संभालने के बाद कहा कि अमेरिका और भारत सच्चे दोस्त हैं। अमेरिका अगले महीने यानी फरवरी में अपनी अगुवाई वाले पैक्स सिलिका समूह में शामिल होने के लिए भारत को न्यौता देगा। दरअसल, भारत चिप डिजाइन और सिलिका, एआई के मामले में काफी आगे हैं। ऐसे में भारत को दरकिनार करना अमेरिका के लिए संभव नहीं है।

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