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  • Indo-US Trade Deal: टैरिफ और सीजफायर की गुगली पर खुद ही कैसे क्लीन बोल्ड हो गए डोनाल्ड ट्रंप

    नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करके टैरिफ घटाकर 18% करने और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का ऐलान किया, वह पूरी दुनिया को चौंका गया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही ट्रंप ने भारत के खिलाफ खुन्नस निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।


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    By Azad Hind Desk फरवरी 4, 2026
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    नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करके टैरिफ घटाकर 18% करने और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का ऐलान किया, वह पूरी दुनिया को चौंका गया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही ट्रंप ने भारत के खिलाफ खुन्नस निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। न जाने कितनी बार भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने वाला दावा किया। 50% टैरिफ लगाने के बाद भी उस अमेरिकी सांसद से गलबहियां करने में परहेज नहीं किया, जिसने इसे 10 गुना बढ़ाने तक की बातें उगलीं। सवाल है कि क्या इन जमीनी हालातों के बावजूद ट्रेड डील अचानक हो गया या फिर यह दोनों देशों के बीच लंबी चर्चाओं और आपसी समझदारी के बाद ही संभव हुआ?

    भारत-अमेरिका ने भविष्य के रोड मैप पर काम किया

    भारत के प्रति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना रवैया ऑपरेशन सिंदूर के बाद की परिस्थियों में पूरी तरह से बदल लिया। उन्हें लगता था कि अगर उन्हें सीजफायर कराने का वाकई में श्रेय मिल जाता तो वह शांति के मसीहा बन जाते और नोबेल प्राइज भी झटक लेते। लेकिन, जब भारत से उन्हें इसपर जरा भी भाव नहीं मिला तो वह इतने चिढ़ गए कि दोनों देशों की वर्षों की दोस्ती को भी दांव पर लगाना शुरू कर दिया। लेकिन, वास्तविकता ये है कि मई 2025 से लेकर फरवरी 2026 तक के 10 महीनों में ट्रंप के कार्यकाल में ही दोनों देश आपसी संबंधों को कायम रखने के लिए भविष्य के रोड मैप पर काम करते रहे।

    भारत-अमेरिका में डील को लेकर चला बैठकों का दौर

    ट्रंप की जुमलेबाजी के बावजूद सच ये है कि दोनों देशों में संबंधों को कायम रखने के लिए आधिकारिक बैठकों का दौर कभी नहीं रुका। इसमें क्वाड (Quad)वर्किंग ग्रुप की बैठकों ने भी बड़ा योगदान दिया। अमेरिका के दोनों दलों के कई सांसद आपसी संबंधों के समर्थन में भारत दौरे पर आते रहे। दूसरी तरफ भारत ने भी अमेरिका के साथ अपने पुराने संबंधों को कूटनीतिक तौर पर कभी कमतर नहीं होने दिया। ट्रंप एक तरफ जो मन में आया बोलते रहे और विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी और डिप्टी एनएसए पवन कपूर पिछले साल अमेरिका यात्रा पर जाते रहे। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भी वाशिंगटन में अमेरिकी सांसदों और अधिकारियों से कूटनीतिक मेलजोल बनाए रखा। पिछले महीने आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी क्रिटिकल मिनरल्स पर हो रही बड़ी पहल में शामिल होने के लिए वाशिंगटन पहुंचे थे।

    अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी निभाया बड़ा रोल

    हालात तब और तेजी से सकारात्मक होने शुरू हो गए, जब भारत में नए अमेरिकी राजदूत के तौर पर सर्जियो गोर ने काम संभाल लिया। व्हाइट हाउस में उनकी सीधी पहुंच ने काम को बहुत ही आसान बना दिया। यूं तो वे अपनी नियुक्ति के साथ ही अमेरिका में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उनके नई दिल्ली आते ही अमेरिकी सांसदों, मंत्रियों और अधिकारियों की भारत यात्रा की झरी लग गई। भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा से ठीक पहले अमेरिकी संसद की सशस्त्र सेवा समिति के अध्यक्ष माइकल रोगर्स दो दलीय सांसदों का प्रतिनिधिमंडल लेकर भारत आए। पिछले हफ्ते ही रैंकिंग मेंबर एडम स्मिथ भी अमेरिकी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली होकर लौटे हैं।

    राजनयिकों, मंत्रियों, सांसदों ने डील का आधार बनाया

    दिल्ली में इन अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों ने जिस तरह से विदेश मंत्री एस जयशंकर, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा दोनों देशों के बिजनेस लीडरों से चर्चाएं की हैं, उससे साफ है कि वह ट्रेड डील को फाइनल करने से पहले उसका आधार तैयार करने के लिए ही भारत आए थे। रोगर्स ने कहा, ‘अमेरिका भारत को एक प्रमुख रक्षा सहयोगी की तरह देखता है।’ वहीं स्मिथ ने कहा कि दोनों देशों में रक्षा सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता और दोनों के आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए फायदेमंद है।

    खुद ही कैसे क्लीन बोल्ड हो गए डोनाल्ड ट्रंप

    अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों से पहले पिछले महीने अमेरिकी सीनेटर स्टीव डानिस भी भारत आए थे। वे अमेरिकी सीनेट के फॉरेन रिलेशन कमेटी के सदस्य हैं। उन्होंने विदेश मंत्री के अलावा वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, भारतीय सांसदों और दोनों देशों के उद्योगपतियों के साथ भी बैठकें की थी। 25 जनवरी को अमेरिका के आर्मी सेक्रेटरी डेनियल ड्रिस्कॉल भी भी भारत आए थे और सीडीएस जनरल उपेंद्र द्विवेदी के साथ बैठक की थी। मतलब, 10 महीने से सिर्फ टैरिफ और सीजफायर की भाषा समझने वाले ट्रंप ने भारत के साथ जो ट्रेड डील का ऐलान किया है, उसका आधार खुद उन्हीं के मंत्रियों और अधिकारियों ने तैयार किया, जिसके सामने उनके पुराने नैरेटिव पूरी तरह से फीके पड़ गए।

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