पिछले दशक में हिंदी साहित्य में कई बदलाव देखने को मिले। इन बदलावों को लेकर साहित्य जगत में काफी गहमागहमी भी रही। आप इस पर क्या कहेंगी?
समय के साथ बदलाव आता है। प्रेमचंद ने जैसा लिखा है, वैसा आज नहीं लिखा जा रहा। आज के लेखक शॉर्टकट अपना रहे हैं। वे जल्दबाजी में लिखना और फिर उसे छपवाना चाहते हैं। इतना ही नहीं वे जल्दी प्रसिद्धि और शोहरत कमाना चाहते हैं। यही कारण है कि लेखन की गुणवत्ता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
आज के लेखक प्रचार को लेकर भी काफी सक्रिय दिखाई देते हैं। ऐसा क्यों?
हां, ऐसा हो रहा है। इसके लिए फेसबुक को अच्छा माध्यम बनाया गया है। इसका फायदा यह है कि जो बातें आप कहना चाहते हैं, वे आसानी से लोगों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन इसका नुकसान यह है कि वहां लिखी गई चीजों को कोई संपादित नहीं करता है।
कुछ समय पहले पुरस्कार वापसी का सिलसिला चला था। इस पर आप क्या कहेंगी?
सबसे बड़ी बात है कि अगर पुरस्कार लौटाना ही रहता है, तो उसे स्वीकार ही क्यों किया जाता है। उस वक्त ही मना कर देना चाहिए। एक नामी लेखक ने जब अपना पुरस्कार वापस किया तो उनकी देखा-देखी कई लोग ऐसा करने लगे। कुछ लोगों ने तो सच में पुरस्कार वापस कर दिया। मगर, कई इसी उधेड़बुन में रहे कि वापस करें या न करें।
आपने ग्रामीण परिवेश, समाज और खेती को काफी करीब से देखा है। क्या आप किसी ऐसे अनुभव पर लिखना चाह रही हैं?
आज का किसान पहले जैसा नहीं रह गया है। आज किसान अनपढ़ नहीं है, जिसे कोई आसानी से फुसला सके। आज के किसान पढ़-लिख गए हैं और अपने अधिकारों को बखूबी समझ रहे हैं। धोती-कुर्ता की जगह अब वे भी जींस पहनने लगे हैं। उन्हें दुनिया-जहान की पूरी जानकारी रहती है। आज किसानी का तरीका भी बदल गया है। हल की जगह ट्रैक्टर से खेत जोते जा रहे हैं। अब तो मजदूर भी खुद से अपनी मजदूरी तय कर रहा है। आज के मजदूरों से आप जबरन काम नहीं करवा सकते हैं। प्रेमचंद के जमाने का घीसू और माधव जैसा किसान अब इतिहास है।
क्या आज भी आपका मन गांव की स्मृति में खोया रहता है?
लोकगीतों से बहुत ताकत मिलती है। मेरी दादी खूब गीत गाती थीं। वह मुझसे भी कहती थीं कि सीख लो और ससुराल में गाना। मैंने एक उपन्यास में भी दादी के गीतों को लिखकर श्रद्धांजलि दी। साथ ही मेरी कलावती चाची के जीवन से प्रेरित होकर भी मैंने एक कहानी लिखी है। हमारे गांव में एक काफी सुंदर बहू थी, लेकिन उसका पति कुरूप था। उस रिश्ते पर भी मैंने एक कहानी लिखी थी।
आप स्त्री लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन आप खुद को किस रूप में देखती हैं?
मुझे जो जरूरी लगा और जिसे समाज में लाना मैंने जरूरी समझा उसी पर लिखा। अक्सर मुझ पर आक्षेप लगाया जाता है कि मैं गांव की औरतों का पक्ष लेती हूं। मगर, सचाई है कि मैंने कभी उनका पक्ष नहीं लिया, बल्कि हमेशा उनका उदाहरण दिया है। ग्रामीण औरतों में जो साफगोई और निर्भीकता है, वह किसी और में नहीं है।
आपको सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करने वाली लेखिका भी कहा जाता है। क्या ये आपकी लेखकीय चेतना का स्वाभाविक हिस्सा है?
जब मैं छोटी थी, तो अपने सामने हो रहे गलत को देखती थी। लेकिन, तब समझ नहीं पाती थी। जैसे-जैसे बड़ी हुई, समझदारी बढ़ी, तब मैंने अपने लेखन के जरिये उसका विरोध किया।
इन दिनों क्या लिख-पढ़ रही हैं?
डॉक्टर साहब के जाने के बाद (पति के निधन) मेरी कलम ठहर गई है, क्योंकि जो भी मैं लिखती थी, सबसे पहले डॉक्टर साहब को ही सुनाती थी।
क्या कोई ऐसा सपना या लक्ष्य है, जिसे आप पूरा करना चाहती हैं?
जीवन में बहुत सी बातें होती हैं, लेकिन हम सब कुछ नहीं लिख सकते। किसी भी तरह के लेखन के लिए कहानी की मांग जरूरी होती है। महज लंबा लिख देने से कुछ नहीं होता है। पाठक तक वही कहानी पहुंचती है, जो उन्हें बांधकर रख सके। जिस व्यक्ति को कहानी या उपन्यास काटना, छांटना और जरूरत के अनुसार जोड़ना आ जाता है वह सही मायने में लेखक बन जाता है।














