ईरान की सड़कों पर आज विद्रोह की लपटें भड़क रही हैं। दिसंबर से शुरू हुआ आंदोलन, जो महंगाई और आर्थिक बदहाली से उपजा था, अब खुले तौर पर इस्लामी गणराज्य को उखाड़ फेंकने की मांग करने लगा है। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं, और क्रूर दमन के बावजूद यह आग बुझने का नाम नहीं ले रही।
व्यापक विरोध प्रदर्शन: पिछले साल 28 दिसंबर को तेहरान के ग्रैंड बाजार और अन्य व्यापारिक केंद्रों से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब देश के 31 प्रांतों तक फैल चुके हैं। शुरू में व्यापारियों और दुकानदारों ने रियाल की भयानक गिरावट (एक डॉलर के लिए 14.5 लाख रियाल) और बेतहाशा बढ़ती महंगाई दर (42%) के खिलाफ हड़ताल की थी। लेकिन, जल्द ही छात्र, महिलाएं, पेंशनभोगी और युवा भी सड़कों पर उतर आए। सरकार ने इंटरनेट और फोन सेवाएं काट दीं, लेकिन स्टारलिंक जैसी सेवाओं ने आंदोलनकारियों को जोड़े रखा। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, 10 जनवरी तक 2,000 से अधिक मौतें हुईं। यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद का सबसे बड़ा विद्रोह है।
बदलेंगे समीकरण: ईरान का संकट दुनिया को हिला रहा है। तेल उत्पादन में बाधा आ सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हुआ तो सऊदी अरब, इराक, UAE का तेल प्रभावित होगा और ब्रेंट 60 डॉलर से ऊपर चढ़ सकता है। ईरान के प्रॉक्सी – हिजबुल्लाह, हमास कमजोर हो चुके हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी। ट्रंप प्रशासन ने कठोर रुख अपनाया है, प्रतिबंध और सख्त होंगे। रूस-चीन समर्थन देंगे, लेकिन यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस के हाथ बंधे हैं। यदि ईरान में सत्ता बदली तो मध्य पूर्व में नया समीकरण बनेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आतंकवाद पर गहरा असर पड़ेगा।
चाबहार प्रॉजेक्ट दांव पर: ईरान हमारा पुराना रणनीतिक साझेदार है। वह पश्चिम एशिया में संतुलन का आधार प्रदान करता आया है, लेकिन मौजूदा विद्रोह ने सब कुछ दांव पर लगा दिया है। चाबहार बंदरगाह इसका जीता-जागता उदाहरण है। 2024 में हुए 10 वर्षीय अनुबंध के तहत इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने 12 करोड़ डॉलर के उपकरण लगाने और 25 करोड़ डॉलर की रुपया क्रेडिट लाइन देने की पेशकश की थी। यह प्रॉजेक्ट अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पाकिस्तान को बायपास करने का सुनहरा द्वार था। लेकिन अब हड़तालें, इंटरनेट ब्लैकआउट और सप्लाई चेन की बाधाओं ने माल उतारना-चढ़ाना पूरी तरह ठप कर दिया है।
कनेक्टिविटी को झटका: चाबहार-जाहेदान रेल लाइन मध्य 2026 तक पूरी होनी थी। 700 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का अभिन्न अंग है। जाहिर है, यह देरी भारत की कनेक्टिविटी को गहरा झटका देगी, खासकर अफगान खनिज और ऊर्जा आयात के मामले में।
आर्थिक नुकसान: ईरान, भारत का दूसरा सबसे बड़ा बासमती चावल बाजार है, जहां 2024-25 में 75.3 करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ। चाय, मसाले (7 करोड़ डॉलर) और फल-ड्राई फ्रूट्स (5.5 करोड़ डॉलर) का व्यापार भी जोरों पर था। ट्रंप प्रशासन की ईरान से व्यापार करने वालों पर 25% टैरिफ की धमकी ने निर्यातकों की नींद उड़ा दी है। पहले से ही पाकिस्तान और रूस जैसे बाजार सिकुड़ चुके हैं। तेल आयात तो 2019 से अमेरिकी CAATSA प्रतिबंधों के कारण शून्य है। ईरान संकट से वैश्विक ऊर्जा मूल्यों में उछाल आने से भारत की महंगाई पर दबाव बढ़ेगा, सो अलग।
सुरक्षा चुनौतियां: तेहरान और इस्फहान में पढ़ने वाले करीब 5 लाख भारतीय छात्र और कारोबारी जोखिम में हैं। विदेश मंत्रालय ने अपनी ताजा अडवाइजरी में कहा है कि वहां फंसे भारतीय जल्द से जल्द ईरान से निकल आएं। BRICS और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) में ईरान की नई सदस्यता पर साझेदारी डगमगा रही है। चीन का ग्वादर प्रॉजेक्ट मजबूत होगा, जिससे पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। अफगानिस्तान में तालिबान की अस्थिरता पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि भारत और ईरान-दोनों ही काबुल के मौजूदा शासन के खिलाफ हैं।
सतर्कता सबसे बड़ा हथियार: भारत ने सदैव संतुलन की कला दिखाई है। इस्राइल और अरब देशों से गहरी दोस्ती के साथ ईरान से रिश्ते बनाए रखे हैं। अब SCO और BRICS मंचों पर मध्यस्थता की भूमिका निभानी होगी। कूटनीतिक दौरे बढ़ाएं, चाबहार बचाने के लिए वैकल्पिक फंडिंग और रूट तलाशें। यदि ईरान में शासन परिवर्तन हुआ, तो नया ईरान भारत के अनुकूल सिद्ध हो सकता है। लेकिन फिलहाल सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है।
(लेखक जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्रफेसर हैं)














