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  • Lohri katha and History : लोहड़ी क्यों मनाते हैं, जानें क्या है लोहड़ी से दुल्ला भट्टी और सुंदरी मुंदरी का संबंध

    लोहड़ी का त्योहार हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि लोहड़ी का दिन सबसे ठंडा दिन होता है और यह साल का अंतिम दक्षिणायन दिन होता है और सूर्यदेव लोहड़ी के गुड़ तिल और मूंगफली खाकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण का शुभ


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    By Azad Hind Desk जनवरी 13, 2026
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    लोहड़ी का त्योहार हर साल मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि लोहड़ी का दिन सबसे ठंडा दिन होता है और यह साल का अंतिम दक्षिणायन दिन होता है और सूर्यदेव लोहड़ी के गुड़ तिल और मूंगफली खाकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण का शुभ समय आरंभ होता है। इसलिए लोहड़ी को सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का पर्व भी माना जाता है।

    लोहड़ी पर्व कब से मनाया जा रहा है
    लोहड़ी पर्व मनाने की शुरुआत कब हुई इसका कोई ठीक-ठीक प्रमाण नहीं मिलता है लेकिन ऐसी कथा मिलती है कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था तब से लोहड़ी का पर्व मनाया जा रहा है। एक कथा मिलती है कि लोहिता नाम की एक राक्षसी थी जिसे कंस ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए भेजा था। गोकुल के लोग मकर संक्रांति का उत्सव मनाने की तैयारी में जुटे थे इसी मौके का फायदा उठाकर लोहिता ने गोकुल में प्रवेश किया और श्रीकृष्ण को मारने का प्रयास किया लेकिन श्रीकृष्ण ने लोहिता का वध कर दिया। लोगों को जब लोहिता राक्षसी के वध की जानकारी मिली तो वह प्रसन्न हुए और मकर संक्रांति से पहले लोहड़ी का पर्व उत्साह पूर्वक मनाया। तब से ही मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।

    लोहड़ी पर्व का कृषि से संबंध
    लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व एक दूसरे से जुड़ा हुआ पर्व है। इन दोनों ही पर्व का संबंध कृषि से भी है। दरअसल इस समय रबी की फसल की बुआई हो चुकी होती है और खरीफ की फसल घर में आ चुकी होती है। और किसान सूर्यदेव को प्रसन्न करना चाहते हैं कि वह उनकी कृषि को उन्नत बनाएं इसलिए मकर संक्रांति और लोहड़ी पर सूर्य के उत्तरायण होने पर और शीत ऋतु की विदाई के लिए सूर्यदेव की पूजा करते हैं और नए फसलों से पकवान बनाकर तिल, गुड़ की सामग्री बनाकर सूर्यदेव को अर्पित करते हैं। जिससे आरोग्य और सुख समृद्धि की वृद्धि बनी रहे।

    दुल्ला भट्टी और सुंदरी मुंदरी की कहानी से लोहड़ी का संबंध
    पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में लोहड़ी का पर्व विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है। पंजाबी समाज में इस दिन लोग भांगड़ा और गिद्दा नृत्य के साथ सुंदरी मुंदरी एवं दुल्ला भट्टी की कहानी कहते और सुनते हैं साथ ही इनके गीत भी गाते हैं। क्योंकि यहां लोहड़ी का संबंध दुल्ला भट्टी की वीरता की कथा से संबंधित है। ऐसी कथा है कि मुगल बादशाह अकबर के समय में पंजाब एक गरीबों का मसीहा हुआ जिसका नाम था दुल्ला भट्टी। ऐसी कहानी है कि सुंदरदास नाम के एक किसान की दो बेटियां थी सुंदरी और मुंदरी जिस पर वहां के नंबरदार बुरी नजर रखता था और उससे शादी करना चाहता था।

    लेकिन सुंदरदास नंबरदार से अपनी बेटियों को बचाना चाहता था ऐसे में उसने अपनी परेशानी दुल्ला भट्टी को बताई। ऐसे में दुल्ला भट्टी ने नंबरदार के खेतों में आग लगा दी और लोहड़ी के मौके पर सुंदरी और मुंदरी को जंगल में लेकर भाग गया और वहीं रात में आग जलाकर उन दोनों का विवाह एक हिंदू लड़के से करवा दिया। उस समय सुंदरी मुंदरी के पास दुल्ला भट्टी को देने के लिए कुछ भी नहीं था। तब उन्होंने दुल्ला भट्टी जिसे उन्होंने भाई माना था शक्कर दिया। बाद में मुगलों में धोखे से दुल्ला भट्टी को मार दिया। तब से गरीबों के मसीहा को लोहड़ी पर याद दिया जाता है और शाम में प्रदोष काल में पवित्र अग्नि जलाकर उसमें गुड़, तिल, मूंगफली, गजक, रेवड़ियां डालकर अग्नि के चारों तरफ घूम-घूमकर लोग सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बिचारा हो ‘गीत गाकर दुल्ला भट्टी को याद करते हैं। इस मौके पर पंजाब में गुड़ और चावल की खीर भी पकायी जाती है।

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