रेत के कण और जल की बूंदों से सूर्य की रश्मियां टकराकर जब मानव शरीर पर पड़ती हैं, तो यह एक प्रकार से रत्न जैसा कार्य करती हैं, जो लाभ रत्न धारण करके प्राप्त किया जाता है, वह अनायास ही त्रिवेणी के जल और रज से टकराने वाली किरणें कर देती हैं। भौतिकी के सिद्धान्त से हम सभी भली-भांति परिचित हैं, अल्बर्ट आइंस्टीन के समीकरण E=mc 2 थ्योरी, जिसे द्रव्यमान-उर्जा समतुल्यता सिद्धांत के रूप में जाना जाता है, जो यह दर्शाता है कि द्रव्यमान और उर्जा एक ही भौतिक इकाई के दो अलग-अलग रूप हैं और द्रव्यमान को उर्जा तथा उर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी प्रकार उर्जा सरंक्षण सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की कुल उर्जा स्थिर रहती है, उर्जा को न तो बनाया जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है, इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।
इस प्रकार भौतिकी के अनेक मूलभूत सिद्धान्तों का ज्ञान भारतीय महर्षियों को था, जिसके चलते उन्होंने जनकल्याण के लिए तीर्थराज प्रयागराज जैसे पवित्र स्थलों पर स्नान, ध्यान, दान की परम्परा को प्रतिपादित किया। जो भी श्रद्धालु यहां जीवन के किसी कष्ट को लेकर आता है, उसके अन्दर की रोग-शोक की एनर्जीस्नान, दान के माध्यम से विसर्जित हो जाती है और उसके स्थान पर एक शुभ एनर्जी, शुभ ऊर्जा का संचरण उसके मन, मस्तिष्क में होने लगता है, जिसके प्रभाव से माह पर्यन्त स्नान, दान, जप, पूजा, अनुष्ठान करने वालों का कल्याण निश्चित होते देखा गया है।
यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे सिद्धान्त के अनुसार जो आकाश में सुदूर ग्रह नक्षत्र है, वही हमारे शरीर में भी विद्यमान हैं। जब कल्पवासी एक महीने का यहां पर कल्पवास का व्रत धारण करते हैं, तो उनके शरीर का कायाकल्प होने लगता है। शोध परिणाम बताते हैं कि त्रिवेणी संगम के तट पर एक माह कल्पवास में निवास करने के कारण व्यक्ति के स्वास्थ्य में सुधार होता है, त्रिवेणी के प्रभाव से एक महीने का कल्पवास करने ग्यारह महीने की शुद्धि हो जाती है। यानी कि एक महीने का लाभ पूरे वर्ष मिलता है।














