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  • Magh Purnima 2026 : माघी पूर्णिमा का शास्त्र सम्मत विधान, स्नान, दान और विष्णु पूजन का पुण्यफल

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मास की पूर्णिमा से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। इस दिन विधिपूर्वक किया गया स्नान मनुष्य को नर्कगमन से मुक्ति प्रदान करता है और स्नान, दान एवं जप के पुण्य प्रभाव से साधक भवसागर को पार कर विष्णु धाम को प्राप्त करता है। माघी पूर्णिमा के विषय में


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    By Azad Hind Desk जनवरी 24, 2026
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    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मास की पूर्णिमा से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। इस दिन विधिपूर्वक किया गया स्नान मनुष्य को नर्कगमन से मुक्ति प्रदान करता है और स्नान, दान एवं जप के पुण्य प्रभाव से साधक भवसागर को पार कर विष्णु धाम को प्राप्त करता है। माघी पूर्णिमा के विषय में शास्त्रों में विशेष विधान वर्णित है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन-

    • तारों के छिपने से पूर्व पवित्र स्नान करते हैं, उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
    • जो व्यक्ति तारों के लुप्त होने के बाद, किंतु सूर्योदय से पूर्व स्नान करते हैं, उन्हें मध्यम फल प्राप्त होता है,
    • जबकि सूर्योदय के पश्चात स्नान करने वाले इस दिन के श्रेष्ठ पुण्य से वंचित रह जाते हैं और उन्हें केवल साधारण फल ही प्राप्त होता है।

    इसी कारण माघी पूर्णिमा पर शास्त्र अनुसार आचरण करते हुए प्रातःकाल तारों के छिपने से पहले स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यताओं के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व जल में भगवान का दिव्य तेज विद्यमान रहता है। देवताओं से संयुक्त यह तेज पापों का शमन करने वाला माना गया है। कहा जाता है कि जब प्रातःकाल आकाश में पवित्र तारों का समूह दृष्टिगोचर हो, उस समय नदी में किया गया स्नान घोर से घोर पापों का भी नाश कर देता है और साधक को पुण्य का अक्षय फल प्रदान करता है। माघी पूर्णिमा के पर्व पर तीर्थस्थलों पर स्नान के लिए आए श्रद्धालुओं को सर्वप्रथम “त्रिवेण्ये नमः” का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए, जिससे उनका संकल्प पूर्ण और साधना फलदायी होती है।

    माघी पूर्णिमा 2026 दान व पूजन
    माघ मास की पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन, पितरों का श्राद्ध कर्म, असमर्थों को भोजन तथा वस्त्रदान करना विशेष फलदायी माना गया है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल, वस्त्र, कंबल, गुड़, कपास, घी, लड्डू, फल, अन्न, स्वर्ण एवं रजत आदि का दान करना चाहिए। इस दिन पूर्ण व्रत का पालन करते हुए ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात कथा-कीर्तन करना और अगले दिन प्रस्थान करना शास्त्रसम्मत बताया गया है। माघी पूर्णिमा की यह तिथि गंगा स्नान के लिए अत्यंत पुण्यदायिनी मानी गई है, जिससे साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

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