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  • Magh Purnima Vrat Katha: माघ पूर्णिमा व्रत कथा, इसके पाठ से मिलेगी भगवान विष्णु की कृपा और हर मनोकामना होगी पूर्ण

    Magh Purnima Vrat Katha In Hindi: माघ पूर्णिमा का महत्व हिंदू धर्म में सबसे अधिक माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास में पड़ने वाली पूर्णिमा तिथि को माघ पूर्णिमा कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवी-देवता पृथ्वी मनुष्य के रूप में आते हैं और गंगा नदी में स्नान करते हैं।


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    By Azad Hind Desk फरवरी 1, 2026
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    Magh Purnima Vrat Katha In Hindi: माघ पूर्णिमा का महत्व हिंदू धर्म में सबसे अधिक माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास में पड़ने वाली पूर्णिमा तिथि को माघ पूर्णिमा कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन देवी-देवता पृथ्वी मनुष्य के रूप में आते हैं और गंगा नदी में स्नान करते हैं। इसलिए माघ पूर्णिमा के दिन स्नान, दान और जप-तप को पुण्य फलदायी माना गया है। इस दिन माघ मास की कथा का पाठ करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन से सभी प्रकार के कष्ट-दुख दूर हो जाते हैं।

    शास्त्रों के अनुसार, कांतिका नगर में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह भिक्षावृत्ति करता था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। इस बात से दोनों बहुत दुखी रहते थे। एक दिन जब वह शहर में भिक्षा मांगने गया, तो लोगों ने उसे ये कहकर कुछ भी देने से इनकार कर दिया की उसकी कोई संतान नहीं है। लोग ब्राह्मण की पत्नी को बांझ कहकर ताना मारते थे। यह सब सुनकर ब्राह्मण बहुत दुखी रहे लगा। इस घटना के बाद किसी ने ब्राह्मण और उसकी पत्नी को 16 दिनों तक लगातार माता काली की पूजा करने की सलाह दी।

    ब्राह्मण दंपति ने विधिपूर्वक 16 दिनों तक माता काली की पूजा की। दंपति की पूजा से प्रसन्न होकर देवी काली 16वें दिन उनके सामने प्रकट हुईं और ब्राह्मण की पत्नी को गर्भधारण का आशीर्वाद दिया। इसके साथ ही माता ने ब्राह्मण दंपति को पूर्णिमा के दिन एक दीपक जलाने और प्रत्येक पूर्णिमा को धीरे-धीरे दीपों की संख्या एक-एक करके बढ़ाने को कहा। दोनों को पूर्णिमा के दिन उपवास रखना था।

    काली माता के बताए अनुसार, ब्राह्मण दंपति ने पूर्णिमा का व्रत रखा और दीपक जलाए। इसके बाद ब्राह्मण की पत्नी गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। ब्राह्मण ने अपने पुत्र का नाम देवदास रखा। लेकिन उसका जीवनकाल अल्प था। देवदास के बड़े होने पर ब्राह्मण ने उसे काशी में अपने मामा के पास पढ़ने के लिए भेज दिया गया।

    काशी में रहते हुए ब्राह्मण के बेटे देवदास का धोखे से विवाह हो गया। इस तरह काफी समय बीत गया। एक दिन जब काल देवदास को लेने आया, तो वह पूर्णिमा का दिन था। इस दिन ब्राह्मण दंपति ने अपने बेटे के लिए पूर्णिमा का व्रत रखा हुआ था। इसी कारण काल उसे अपने साथ नहीं ले जा सका और ब्राह्मण दंपति के बेटे को नया जीवन मिल गया। इसी प्रकार, पूर्णिमा के दिन व्रत रखने से व्यक्ति के कष्टों का अंत होता है और उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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