सुप्रीम कोर्ट किसकी अर्जी पर कर रहा था सुनवाई
जस्टिस दीपांकर दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ खलील अंसारी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो दरगाह हजरत मलिकुल मशाइख मकदूम लाडले अंसारी (सुन्नी) की प्रबंध समिति के सचिव बताए जाते हैं।
महाशिवरात्रि जैसे अनुष्ठानों के लिए हाईकोर्ट ने दिए आदेश
याचिकाकर्ता के अनुसार, हालांकि, वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा संपत्ति को पहले ही वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया था। मगर, कई तीसरे पक्षों द्वारा विशिष्ट अवसरों पर पूजा-अर्चना करने की अनुमति मांगने के लिए हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं और अन्य आवेदन दायर करने का एक सिलसिला चल रहा था।
हाईकोर्ट ने समय-समय पर अनुष्ठानों के निपटाने के लिए तदर्थ व्यवस्थाओं की अनुमति देते हुए आदेश पारित किए हैं, जिनमें आगामी 15 फरवरी को आने वाली शिवरात्रि भी शामिल है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दिए ये तर्क
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस प्रकार के दखल से संपत्ति के धार्मिक स्वरूप में परिवर्तन होगा, जो पूजा स्थल अधिनियम का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने दरगाह के वक्फ स्वरूप की रक्षा करने और परिसर में अन्य अनुष्ठानों की अनुमति देने वाले आदेशों को पारित होने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की।
याचिकाकर्ता ने दिसंबर 2024 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश का भी हवाला दिया जिसमें न्यायालयों को संपत्तियों के धार्मिक स्वरूप पर प्रश्न उठाने वाली नई याचिकाओं पर विचार करने से रोक दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा, जान लीजिए
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने कहा कि उच्च न्यायालय के मामले पहले ही तय हो चुके हैं और याचिकाकर्ता को सर्वोच्च न्यायालय में जाने के लिए विवश होना पड़ रहा है क्योंकि ‘रेस ज्यूडिकाटा’ का सिद्धांत लागू होता है।
उन्होंने कहा-अब न्यायालय इन मामलों पर सुनवाई नहीं कर सकते। इस पर जस्टिस दत्ता ने असहमति जताते हुए कहा-जब तक यह अखिल भारतीय मुद्दा न हो, तब तक… आपको याचिका खारिज करने का आदेश देते हैं, उसके बाद हम विचार करेंगे।
आपकी अर्जी हाईकोर्ट खारिज कर दे तो यहां वेलकम
पीठ ने कहा-अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर सुनवाई करने का यह कोई तरीका नहीं है। सिर्फ इसलिए कि हाईकोर्ट ने… अनुच्छेद 32 इसके लिए नहीं बनाया गया था…कि कर्नाटक हाईकोर्ट में कुछ आदेश पारित किए गए हैं और वे ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में लागू होंगे।” मखीजा ने जवाब दिया कि याचिकाकर्ता अनुच्छेद 26 के तहत अपने धार्मिक अधिकारों का सहारा ले रहा है।
इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा-अगर हाईकोर्ट आपकी याचिका खारिज कर देता है, तो आपका स्वागत है। न्यायाधीश ने गौर किया कि याचिकाकर्ता अनुच्छेद 32 के तहत यह घोषणा चाहता है कि विवादित संपत्ति विधिवत अधिसूचित वक्फ संपत्ति है, जो वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा की जानी है।
हर साल महाशिवरात्रि से पहले ले लेते है राहत
मखीजा ने बताया कि वक्फ ट्रिब्यूनल ने पहले ही संपत्ति को वक्फ घोषित कर दिया है। उन्होंने कहा कि इस घोषणा के बावजूद, तीसरे पक्ष हर साल (2023 से) रिट याचिकाएं दायर करते हैं और महाशिवरात्रि से पहले राहत की मांग करते हैं।
मखीजा ने यह भी बताया कि इस मामले में पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित कई मुद्दे शामिल हैं और उन्होंने अनुरोध किया कि इसे पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित मामलों के साथ जोड़ दिया जाए। लेकिन बेंच ने यह अनुरोध अस्वीकार कर दिया। अंततः, बेंच ने मामले को वापस ले लिया और खारिज कर दिया।
क्या है यह मामला, इसे जानते हैं
याचिका के अनुसार, विवादित संपत्ति हजरत मरदान-ए-गैब की समाधि है और इसे 1976 में वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था। 1968 में नगर परिषद ने मौके पर निरीक्षण करने के बाद दरगाह परिसर के भीतर समाधि या मंदिर के निर्माण की अनुमति मांगने वाले आवेदन को अस्वीकार कर दिया। 2022 में अंडोला में प्रतिवादी नंबर 7-श्री सिद्धलिंगस्वामी करुणेश्वर मंदिर ने महाशिवरात्रि पर मजार (कब्र) पर ‘शिवलिंग को शुद्ध करने’ के लिए ‘अलांद चलो’ पदयात्रा की घोषणा की थी।
प्रबंध समिति ने कर्नाटक वक्फ न्यायाधिकरण में स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए याचिका दायर की, जिस पर 2024 में फैसला सुनाया गया। हालांकि, इस फैसले को चुनौती अभी लंबित है। याचिका में जनवरी 2026 में दायर एक मुकदमे का भी जिक्र, जिसमें यह घोषणा करने की मांग की गई है कि संत राघव चैतन्य की समाधि दरगाह के भीतर मौजूद है।













