मकर संक्रांति पर तिल खाने की परंपरा
श्रीमद्भागवत और देवी श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के मुताबिक, शनिदेव को अपने पिता से वैर भाव था। इसके पीछे का कारण है कि सूर्यदेव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेदभाव करते देखा था। तब रुष्ट होकर सूर्यदेव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को खुद से दूर कर दिया। उस समय शनि और छाया ने सूर्य महाराज को कुष्ठ रोग होने का श्राप दे दिया था।
जब यमराज ने अपने पिता सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से पीड़ित होते देखा तो वो तपस्या करने लगे। यमराज द्वारा तपस्या करने से सूर्यदेव कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए। शनिदेव और छाया के व्यवहार से क्रोधित होने पर सूर्यदेव ने शनि महाराज के घर ‘कुंभ’ जिसे शनि की राशि कहते हैं उसको जला दिया। इसी के चलते शनिदेव और उनकी माता छाया को कष्ट उठाना पड़ा था। उस समय यमराज ने शनि महाराज और सौतेली मां की पीड़ा को देखकर उनके कल्याण हेतु पिता सूर्य देव को खूब समझाने की कोशिश की।
यमराज के विनती करने के बाद सूर्यदेव शनि के घर कुंभ में पहुंचे। वहां सब कुछ जल चुका था, तब शनि महाराज के पास केवल तिल बचे थे। ऐसे में उन्होंने काले तिल से ही सूर्य देव की पूजा की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने शनि महाराज को आशीर्वाद देते हुए कहा कि, शनि के दूसरे घर मकर राशि में जब-जब मेरा आगमन होगा तब मैं शनि का घर धन-धान्य से भर दूंगा। उस समय तिल से पूजा करने के कारण ही शनि को दोबारा वैभव प्राप्त हुआ था। यही कारण है कि शनिदेव को तिल बेहद प्रिय है और तभी से मकर संक्रांति पर तिल से सूर्य और शनिदेव की पूजा की जाती है। साथ ही, इससे जुड़ी चीजों का दान करना और उन्हें खाना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। शनिदेव को सूर्यदेव ने यह आशीर्वाद भी दिया कि जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन काले तिल द्वारा सूर्य की पूजा करेगा उसे सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसे में इस दिन काले तिल से सूर्यदेव की पूजा अवश्य करनी चाहिए। इससे आरोग्य की प्राप्त हो सकती है और शनि के अशुभ प्रभावों से भी राहत मिलती है।
मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा
मान्यता है कि इसके पीछे शिवजी के अवतार बाबा गोरखनाथ की कथा छिपी हुई है। खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को उनसे संघर्ष करने के चलते भोजन पकाने का वक्त नहीं मिल पाता था। इसी के चलते योगी अक्सर भूखे ही रह जाते थे और कमजोर होने लगे थे। इस दुविधा का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने एक सलाह दी। उन्होंने योगियों को दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने को कहा। यह व्यंजन स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी था और जल्दी पक जाता था। इसका सेवन करने से तुरंत ऊर्जा मिलने लगी और नाथ योगियों को व्यंजन पसंद आने लगा। तब बाबा गोरखनाथ ने इसका नाम ‘खिचड़ी’ रखा था। इसके बाद, गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ मंदिर के पास मकर संक्रांति पर खिचड़ी मेला की शुरुआत हुई है। काफी दिनों तक चलने वाले इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का ही प्रसाद चढ़ाया जाता है और इसे सभी में बांटा जाता था। तभी से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने की परंपरा का आरंभ हुआ।














