मकर संक्रांति पर गंगासागर मेले का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, गंगा मां जब भोलेनाथ की जटा से निकलकर पृथ्वी पर पहुंची कब वह भागीरथी के पीछे-पीछे जाकर कपिल मुनि के आश्रम में जाकर सागर से मिल गई थीं। उस दिन संक्रांति थी। ऐसा माना जाता है कि माता गंगा के पवित्र जल से राजा सागर के 60 हजार शापग्रस्त पुत्रों का उद्धार हो गया था। यही कारण है कि तीर्थ गंगासागर का नाम प्रसिद्ध हुआ। ऐसे में गंगासागर पर मकर संक्रांति के दिन हर साल मेले का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि यहां पावन स्नान करने से 100 अश्वमेध यज्ञ करने के समान फल प्राप्त होता है।
गंगासागर स्नान का क्या है महत्व
मान्यता है कि मकर संक्रांति पर गंगासागर में जीवन में एक बार पावन स्नान करने से जन्मों के पाप कट जाते हैं और बेहद पुण्य फल प्राप्त होता है। ऐसा भी कहा जाता है कि गंगासागर में स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां पावन स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। मान्यता है कि गंगासागर में मकर संक्रांति पर स्नान करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती है।
गंगासागर को क्यों कहते हैं महातीर्थ
गंगासागर को भारत के सभी तीर्थस्थलों में महातीर्थ माना गया है। कहा जाता है कि जो पुण्य व्यक्ति को जप-तप, धार्मिक कार्यों, दान, तीर्थ यात्रा आदि से प्राप्त होता है। वह उसे केवल गंगासागर में के तीर्थयात्रा और स्नान से मिल जाता है। पहले वहां तक पहुंचना बहुत कठिन होता था क्योंकि उस स्थान पर इतनी सुविधाएं नहीं थी। इसलिए भी इसे ‘सारे तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार’ कहा जाता था। गंगासागर स्नान मेले का आयोजन हुगली नदी के तट पर किया जाता है। यहां गंगा बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है और जहां गंगा और सागर का मिलन होता है। उसी स्थान को गंगासागर नाम से जाना जाता है।














