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  • Opinion: आजादी के 78 साल बाद भी जातियों में बंटने को तैयार है भारत, इसलिए आज भी जरूरी हैं बापू

    नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज 78वीं पुण्यतिथि है। समाज को एक सूत्र में बांधने वाले बापू आज जातियों में बंटते भारत को देखकर बेहद दुखी होंगे। विपक्ष की जातिगत जनगणना की मांग से लेकर सरकार के यूजीसी बिल तक, आज भी देश की सियासत के लिए जातिगत बंटवारा अहम बना हुआ है। इस


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    By Azad Hind Desk जनवरी 30, 2026
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    नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज 78वीं पुण्यतिथि है। समाज को एक सूत्र में बांधने वाले बापू आज जातियों में बंटते भारत को देखकर बेहद दुखी होंगे। विपक्ष की जातिगत जनगणना की मांग से लेकर सरकार के यूजीसी बिल तक, आज भी देश की सियासत के लिए जातिगत बंटवारा अहम बना हुआ है।

    इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाकर मौजूदा सामाजिक ताने बाने के बारे में सबको सोचने पर मजबूर किया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि यूजीसी के नए नियम ऐसे महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं, जिन्हें अनदेखा किया गया तो समाज विभाजित हो सकता है। कोर्ट ने कहा है कि आजादी के इतने साल बाद भी समाज जातियों से मुक्त नहीं हो रहे हैं और ऐसे फैसले हमें पीछे लेकर जा रहे हैं। इस टिप्पणी ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हम गांधीवादी विचारों से दूर हो रहे हैं। आज मौका और दस्तूर दोनों है, दरअसल आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है।

    गांधी, भारत की धरती में जन्मे एक ऐसे शख्स थे, जिन्होंने सवर्ण जाातियों को साथ लेकर समाज के पिछड़े, वंचितों और दलितों के उत्थान के लिए प्रयास किया। उनके भीतर समाज को जोड़ने की ऐसी कला थी कि उनके एक शब्द-शब्द के पीछे लोग बिना सोचे समझे चलने को तैयार हो जाते थे। वहीं इससे उलट आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी है। इसे समझना का सबसे ताजा उदाहरण यूजी की नई गाइडलाइंस है।

    समाज के बारे में कौन सोचेगा?

    सवर्ण वर्ग ने इन नियमों पर ऐतराज जताते हुए अपना विरोध जताया और सोशल मीडिया पर अभियान #ROLLBACKUGC अभियान छेड़ दिया। सवर्ण जाति के लोगों का कहना था कि इन नियमों में सवर्ण जाति के छात्रों के खिलाफ झूठी शिकायत करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई का कोई नियम नहीं है। वहीं सवर्ण जाति के रुख को देखकर एससी/एसटी/ओबीसी समुदाय के लोग भी विरोध के लिए सामने आ गए। दोनों पक्ष सोशल मीडिया पर एक दूसरे पर हमलावर हो गए। दोनों पक्षों ने सामाजिक ताने बाने को एक झटके में खारिज कर दिया।

    राजनीतिक दलों के मौन से समाज को सबसे ज्यादा नुकसान

    उधर राजनीतिक दलों ने इस मामले पर मौन साधकर अपने-अपने समुदाय का साथ निभाना जरूरी समझना। किसी भी दल के नेता ने आगे बढ़कर इस मामले पर समाज की सारी जातियों को एकसाथ लाने का प्रयास तक नहीं किया। आजादी के 78 साल बाद भी देश को जातियों के संघर्ष में झोंकने की पूरी तैयारी हो गई थी। अगर सुप्रीम कोर्ट की एंट्री नहीं होती तो आज हालात कुछ और होते।

    सवालों के घेरे में राजनीतिक दल

    यहां सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि देश की राजनीतिक दल जातिगत वोट बैंक के आगे इतने मजबूर हैं कि वो जातियों को आपस में जोड़ने की एक हल्की सी अपील भी नहीं कर सकते। फिलहाल ये मामला कुछ दिनों के लिए शांत हो गया है, लेकिन ये मामला अपने पीछे कई सवाल खड़े कर गया है। गांधी की पुण्यतिथि पर गांधी को याद करने वाले लोगों को एक बार जरूर सोचना चाहिए कि आजादी के 78 साल बाद भी जातियों पर लड़ते भारत को देखकर गांधी की आत्मा कितनी दुखी हुई होगी।

    समाज को जोड़ने के लिए गांधी ने किया है बहुत संघर्ष

    महात्मा गांधी ने सभी जातियों को एक साथ जोड़ने का अथक प्रयास किया। उन्होंने सवर्णों को प्रेरित करने के लिए देश भर में यात्राएं कीं, सभाओं को संबोधित किया और दलितों के उत्थान में योगदान देने का आग्रह किया। गांधीजी का मानना था कि अस्पृश्यता एक सामाजिक बुराई है, जिसे दूर करना सवर्णों का नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने सवर्णों के हृदय परिवर्तन पर जोर दिया ताकि वे दलितों को अपने भाइयों के समान स्वीकार करें।

    दलितों के उत्थान के लिए सवर्णों को साथ लेकर चले बापू

    मंदिर प्रवेश और सामाजिक समानता के लिए भी उन्होंने आवाज उठाई और सवर्णों को दलितों के लिए मंदिर, तालाब और कुएं खोलने के लिए प्रेरित किया। आर्थिक सहयोग की अपील करते हुए उन्होंने सवर्णों से दान देने और दलितों के शैक्षिक व सामाजिक सुधार में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य सवर्णों के दृष्टिकोण में बदलाव लाकर भारतीय समाज में समरसता स्थापित करना और दलितों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना था।

    जब समाज के नेताओं ने थामा गांधी का हाथ

    • महात्मा गांधी ने जब छुआछूत खत्म करने का बीड़ा उठाया, जिसे हरिजन आंदोलन भी कहा जाता है, तब कई बड़े सवर्ण नेता उनके साथ आए। इन नेताओं का मकसद हिंदू समाज को बेहतर बनाना था।
    • डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय, जमनालाल बजाज और घनश्याम दास बिड़ला जैसे प्रमुख सवर्ण नेताओं ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
    • डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने चंपारण सत्याग्रह में दलितों के उत्थान में अहम भूमिका निभाई।
    • जमनालाल बजाज ने 1928 में वर्धा के लक्ष्मी नारायण मंदिर को दलितों के लिए खुलवाया, जो सवर्णों के समर्थन का एक बड़ा उदाहरण था।
    • घनश्याम दास बिड़ला हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष बने और उन्होंने दलितों की शिक्षा और रहने के लिए पैसे जुटाने में मदद की।
    • मदन मोहन मालवीय ने भी दलितों को समाज में सम्मान दिलाने और मंदिरों में प्रवेश दिलाने के प्रयासों का साथ दिया।
    • गांधीजी का मानना था कि छुआछूत मिटाना सवर्ण हिंदुओं की जिम्मेदारी है, इसलिए उन्होंने उनसे इस आंदोलन में आगे आने की अपील की थी।
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