अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।
अंगद ने खुद की शक्ति पर शंका करते हुए कहा कि, ‘मैं लंका जा तो सकता हूं, लेकिन वापस आ सकूंगा या नहीं, इस पर मुझे संदेह है।’ इस विषय पर एक कथानक प्राप्त होता है जिसके अनुसार अंगद ने जामवंत से कहा, ‘मैं जा तो सकता हूँ लेकिन वापस आने में मुझे संदेह है और इस संदेह का कारण लंका में रावण पुत्र अक्षयकुमार है।’
अंगद ने कहा, ‘मैं और अक्षयकुमार, दोनों, देवगुरु बृहस्पति के गुरुकुल में पढ़ते थे। अंगद और रावण पुत्र अक्षयकुमार का अक्सर विवाद हो जाता था। एक बार अक्षयकुमार ने मेरी शिकायत देवगुरु बृहस्पति से कर दी।’ अंगद ने कहा, ‘देवगुरु बृहस्पति ने मुझे समझाया कि दोबारा ऐसा न करना। लेकिन मैंने उनकी बात न मानी और अगली बार भी अक्षयकुमार की पिटाई की। इस पर अक्षयकुमार ने फिर से देवगुरु बृहस्पति से शिकयत की। देवगुरु बृहस्पति ने मुझे श्राप दिया कि अगर फिर कभी मैंने अक्षयकुमार से लड़ाई की तो मेरी मृत्यु हो जायेगी।’ अंगद ने आगे बताया, ‘मैं लंका तो चला जाऊँगा लेकिन यदि अक्षयकुमार से मेरी लड़ाई हुई तो मेरी मृत्यु निश्चित है, इसलिये मुझे लंका से वापस आने में संदेह है।’ कहा जाता है कि जामवंत ने अंगद
को इसलिए भी नहीं भेजा क्योंकि वे युवराज थे, युवराज का दूत बनकर जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं था। अंगद की बात सुनकर जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाई और उन्हें लंका जाने का कार्य सौंपा, क्योंकि हनुमान जी इस कार्य के लिए पूरी तरह सक्षम थे। जीवन में हमें शंकालू न होकर श्रद्धावान बनने का यंह संदेश इस कथानक से प्राप्त हो रहा है।














