जानकारों के मुताबिक इस बात की उम्मीद कम है कि भारत रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद कर देगा। हां इसमें कुछ गिरावट जरूर आ सकती है। और यह गिरावट आनी भी शुरू हो गई है। ऑइलप्राइसडॉटकॉम की एक खबर के मुताबिक भारत के लिए रूसी तेल की खरीद रोकना मुश्किल हो सकता है। वहीं रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय तेल रिफाइनरी कंपनियों इंडियन ऑइल और एचपीसीएल ने अब वेनेजुएला से तेल मंगवाना शुरू कर दिया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रूस से तेल खरीद रोक दी है और उसने वेनेजुएला से तेल का एक बड़ा जहाज खरीदा है।
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भारत ने कम की खरीदारी
भारत अपनी जरूरत का 85% तेल बाहर से मंगाता है। इसमें से एक तिहाई तेल रूस से आता था। लेकिन पिछले साल नवंबर में ट्रंप ने रूस के बड़े तेल निर्यातकों पर बैन लगा दिया था। साथ ही भारत पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की बात कही थी। उसके बाद से भारत ने रूसी तेल की खरीद पर कुछ रोक लगाई। अब ट्रंप चाहते हैं कि भारत रूसी तेल को खरीदना पूरी तरह से बंद कर दे।
ट्रंप की इस बात से रूस ज्यादा परेशान नहीं हो रहा है। हाल ही में क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने मीडिया से कहा, ‘हम और दुनिया भर के सभी ऊर्जा विशेषज्ञ यह जानते हैं कि रूस भारत को तेल और पेट्रोलियम उत्पाद बेचने वाला अकेला देश नहीं है। भारत हमेशा से दूसरे देशों से भी ये उत्पाद खरीदता रहा है। इसलिए, हमें इसमें कुछ भी नया नजर नहीं आता।’
रूसी तेल भारत के लिए क्यों है खास?
- रूस के नेशनल एनर्जी सिक्योरिटी फंड के एक ऊर्जा विशेषज्ञ ने बताया कि अमेरिका जो शेल ऑयल बेचता है, वह हल्का और गैस कंडेनसेट जैसा होता है।
- वहीं रूस तेल भारी और सल्फर वाला यूराल कच्चा तेल बेचता है।
- इसका मतलब है कि भारत को अमेरिकी कच्चे तेल को दूसरे ग्रेड के तेलों के साथ मिलाना पड़ेगा, जिसमें अतिरिक्त खर्च आएगा। इसलिए, सीधे तौर पर एक तेल की जगह दूसरा तेल लेना संभव नहीं होगा।
- सिर्फ तेल की क्वालिटी ही नहीं, कीमत भी दूसरा फेक्टर है। रूस की तेल दूसरे देशों के तेल के मुकाबले काफी सस्ता है।
- रूस तेल पर लगातार डिस्काउंट दे रहा है। पहले यह डिस्काउंट प्रति बैरल 7 से 8 डॉलर था। यह अब बढ़कर 11 डॉलर तक हो गया है। ऐसे में रूसी तेल को पूरी तरह छोड़ना भारत के लिए आर्थिक रूप से भी नुकसानदायक होगा।
अमेरिका का तेल कितना महंगा?
वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) के मुताबिक अमेरिकी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए महंगा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि इसे अमेरिका के खाड़ी तट से भारत तक भेजने में ज्यादा समय लगता है। Vortexa के विश्लेषकों ने कहा कि इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरियों को प्रति बैरल 7 डॉलर ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे, जो ज्यादातर रिफाइनरियों को पसंद नहीं आएगा। एक Kpler विश्लेषक ने WSJ को बताया कि रिफाइनरियां यूराल तेल के बिना काम करने में तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन रूस से तेल की खरीद को तेजी से बंद करना व्यावसायिक रूप से चुनौतीपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील होगा।













