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  • Russian Oil Import to India: अमेरिकी बैन भी नहीं तोड़ पाएगा भारत की रूस से दोस्ती, तेल का आयात जारी रहेगा

    नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन देशों पर टैरिफ के जरिए लगाम कसने की कोशिश कर रहे हैं जो रूस से खरीद रहे हैं। इनमें भारत भी शामिल है। उन्होंने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है। इसमें 25 फीसदी सिर्फ इस कारण है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है। वहीं ट्रंप


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    By Azad Hind Desk जनवरी 18, 2026
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    नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन देशों पर टैरिफ के जरिए लगाम कसने की कोशिश कर रहे हैं जो रूस से खरीद रहे हैं। इनमें भारत भी शामिल है। उन्होंने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है। इसमें 25 फीसदी सिर्फ इस कारण है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है। वहीं ट्रंप ने हाल ही में फिर से 500 फीसदी टैरिफ लगाने की बात कही है। एक्सपर्ट के मुताबिक इसके बाद भी भारत रूस से लगातार तेल खरीदना जारी रखेगा।

    ग्लोबल रियल टाइम डेटा और एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के मुताबिक ट्रंप की 500 फीसदी टैरिफ की धमकी के बाद भी भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात जनवरी में भी मजबूत बना रहने की उम्मीद है। केप्लर के अनुसार, भारत जनवरी में रूस से हर दिन करीब 1.3 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात कर सकता है। सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और रोसनेफ्ट से जुड़ी नायरा एनर्जी ने इस महीने यानी जनवरी में रूस से कच्चा तेल खरीदना बढ़ा दिया है। वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस बार रूस से कोई तेल नहीं खरीदा है।
    Russian Crude Oil Import: रूसी तेल पर अमेरिकी बैन के बाद भी भारत देख रहा फायदा, इन कंपनियों ने बढ़ाई खरीद

    …तो खरीद के तरीके बदल देगा टैरिफ

    मनी कंट्रोल के मुताबिक केप्लर के लीड रिसर्च एनालिस्ट (रिफाइनिंग एंड मॉडलिंग) सुमित रितोलिया ने कहा कि अगर रूसी तेल खरीदने पर लगने वाले 500% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव वाकई में लागू होता है, तो यह खरीद के तरीके को पूरी तरह से बदल देगा। उन्होंने कहा कि इससे रातों-रात तेल की कमी नहीं होगी, लेकिन जोखिम को लेकर सोच बदल जाएगी। रितोलिया के मुताबिक जनवरी 2026 तक भारत में रूसी कच्चे तेल का आयात लगभग 1.1 से 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) रहने का अनुमान है।

    रूसी तेल आयात में तेजी का कारण

    दिसंबर 2025 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात काफी कम हो गया था। नवंबर में यह 1.84 mbd था, जो दिसंबर में घटकर करीब 1.2 mbd रह गया। यह गिरावट अमेरिका द्वारा रूस की प्रमुख तेल कंपनियों, रोसनेफ्ट और लुकोइल पर नए प्रतिबंध लगाने के बाद आई है। केप्लर का कहना है कि यह गिरावट 2022 के अंत के बाद सबसे कम आयात है, लेकिन यह एक अस्थायी खरीद समायोजन है, न कि कोई बड़ा बदलाव।

    रितोलिया ने बताया कि रूसी तेल अभी भी आर्थिक रूप से सस्ता और भारत की रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है। जनवरी से आयात फिर से बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि व्यापार गैर-निर्दिष्ट बिचौलियों (non-designated intermediaries) के माध्यम से होगा। जब तक बड़े पैमाने पर सेकेंडरी बैन नहीं लगते, तब तक रूसी कच्चा तेल भारत की तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहेगा।

    बिचौलियों के कारण सप्लाई

    रूसी कच्चा तेल बिचौलियों, व्यापारियों और अन्य तरीकों से भारत पहुंच रहा है। अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों से सीधी खरीद कम हो गई है, लेकिन ततनेफ्ट, रेडवुड ग्लोबल सप्लाई, रुसेक्स्पोर्ट, मोरेक्स्पोर्ट और अल्गाफ मरीन जैसी अन्य कंपनियां इस कमी को पूरा कर रही हैं।

    भारत के पास और क्या हैं विकल्प?

    अगर रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद होती भी है तो भारत के पास दूसरे विकल्प भी मौजूद हैं। मध्य पूर्व के देशों से तेल आसानी से मिल सकता है, जो रूसी तेल की कमी को पूरा कर सकता है। इसके अलावा, अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका से भी तेल मंगाया जा सकता है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि असली नुकसान रियायती दरों पर मिलने वाले तेल को खोने का होगा। इससे तेल की औसत कीमत बढ़ जाएगी और भारत को लंबी अवधि के अनुबंधों, तेल स्रोतों में विविधता लाने और अपनी रिफाइनरियों को बेहतर बनाने पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

    भारत को कितना नुकसान

    केप्लर के मुताबिक अगर रूस से तेल मिलना बंद हो जाता है या उस पर भारी जुर्माना लगता है, तो भारत का सालाना कच्चा तेल आयात बिल 3 से 4 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह अनुमान इस बात पर आधारित है कि अगर 1.8 mbd तेल की जगह दूसरे स्रोतों से मंगाना पड़े और हर बैरल पर 5 डॉलर का अतिरिक्त खर्च आए। इस तरह की छूट वाली कीमत का फायदा न मिलने से न केवल तेल खरीदने की लागत बढ़ेगी, बल्कि सरकार के खजाने पर भी बोझ पड़ेगा।

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