• Religion
  • Sakat Chauth Vrat Katha: सकट चौथ की व्रत कथा, इसके पाठ के बिना अधूरा है व्रत, नहीं मिलेगा पूरा फल

    Sakat Chauth Vrat Katha : सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। भगवान गणेश के साथ चंद्र देव की भी पूजा इस दिन की जाती है। माताएं संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन व्रत कथा का पाठ करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk जनवरी 6, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    Sakat Chauth Vrat Katha : सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश को समर्पित माना जाता है। भगवान गणेश के साथ चंद्र देव की भी पूजा इस दिन की जाती है। माताएं संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन व्रत कथा का पाठ करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सकट चौथ की व्रत कथा के बिना व्रत अधूरा रहता है और उसका पूरा फल प्राप्त नहीं होता। पूजा के बाद कथा सुनने से गणेश जी की कृपा से संतान सुख प्राप्त होता है और संकटों से छुटकारा मिलता है।

    सकट चौथ की व्रत कथा
    प्राचीन समय की बात है। एक नगर में देवरानी-जेठानी रहती थी। जेठानी बेहद अमीर थी, जबकि देवरानी बहुत गरीब थी। दोनों का जीवन एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत था। जेठानी धनवान थी, उसका घर भरा-पूरा था और किसी चीज की कमी नहीं थी। वहीं, देवरानी बहुत गरीब थी। उसकी गरीबी इतनी थी कि उसे अपने जीवन यापन के लिए रोज जेठानी के घर काम करना पड़ता था। दिनभर सेवा-टहल करने के बाद जो थोड़ा-बहुत चूनी-चोकर मिल जाता था, उसी से वह अपनी झोपड़ी में भोजन बनाती। फूटे घड़े से पानी पीती और टूटी हुई चारपाई पर सो जाती। यही उसका रोजाना का जीवन था।

    सकट चौथ का दिन आया। देवरानी पूरे दिन भूखी-प्यासी जेठानी के घर काम करती रही। रात होने पर जब वह लौटने लगी तो उस दिन जेठानी ने उसे कुछ भी खाने के लिए नहीं दिया। खाली हाथ वह अपनी झोपड़ी में आ गई। घर में अनाज का एक दाना तक नहीं था। देवरानी खेत से थोड़ी बथुआ की साग तोड़ लाई। इधर-उधर से चावल के कुछ दाने चुनकर इकट्ठा किए और उनके छोटे-छोटे लड्डू बनाकर रख लिए। रात को सकट माता उसके दरवाजे पर पहुंची। टटिया के पास खड़ी होकर उन्होंने आवाज दी ब्रह्माणी दरवाजा खोलो। देवरानी ने अंदर से कहा कि माता आप भीतर आ जाओ किवाड़ तो है ही नहीं। अंदर आते ही सकट माता ने कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है। देवरानी ने बिना संकोच कन के लड्डू और बथुआ का साग उनके सामने रख दिया।

    सकट माता ने प्रेमपूर्वक भोजन किया। फिर पानी मांगा। देवरानी फूटी हुई गगरी में पानी ले आई। पानी पीने के बाद माता ने विश्राम करने की इच्छा जताई। देवरानी ने अपनी टूटी चारपाई उनके लिए बिछा दी। थोड़ी देर बाद सकट माता ने शौच के लिए स्थान पूछा। देवरानी ने कहा माता आप जहां उचित समझें वहीं बैठ जाइए। माता ने पूरे घर में शौच कर दिया। जब भी उन्हें लगा कि अभी पूरी तरह निपटा नहीं तो उन्होंने फिर पूछा और देवरानी ने इस बार कहां कि अब मेरे सिर पर ही कर दो। अंत में माता ने देवरानी के सिर से पांव तक शौच कर दिया और वहां से चली गईं। सुबह जब देवरानी की आंख खुली, तो उसकी झोपड़ी कंचनमय हो चुकी थी। चारों ओर सोना ही सोना बिखरा पड़ा था। टूटी चारपाई, फूटा घड़ा सब सोने के बन चुके थे। वह सोना समेटते-समेटते थक गई, लेकिन सोना कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

    इधर जब देवरानी समय पर काम पर नहीं पहुंची तो जेठानी क्रोधित हो गई। उसने अपने बेटे को उसे बुलाने भेजा। जब लड़के ने आकर बताया कि देवरानी की झोपड़ी सोने से भरी पड़ी है, तो जेठानी घबरा गई। वह स्वयं दौड़कर वहां पहुंची और देवरानी से पूछा किसको घूसा, किसको मूसा ? इस पर देवरानी ने कहा कि यह सब सकट माता की कृपा है। जेठानी ने पूछा की ऐसा तुने क्या खिला दिया था जो सकट माता प्रसन्न हो गई। देवरानी बोली कि उसने उन्हें बस कन के लड्डू और बथुआ का साग ही खिलाया था। यह सुनकर जेठानी के मन में लालच आ गया। वह घर लौट आई और अगले सकट चौथ पर देवरानी की नकल करने लगी और गरीबों की तरह रहने लगी। सकट चौथ के दिन उसने जानबूझकर कन के लड्डू बनाए, बथुआ पकाया और फूटी गगरी व टूटी चारपाई रख दी। रात को सकट माता की राह देखने लही। गहरी रात हुई और सकट माता ने दरवाजा खटखटाया। जेठानी बोली माता दरवाजा कहां है, टटिया खोलो और अंदर आ जाओ। सकट माता ने पिछले साल जैसा देवरानी के साथ किया था वैसा ही इस बार जेठानी के साथ किया। माता ने खाया-पिया और पूरे घर में और जेठानी के ऊपर सौच कर चली गईं। सुबह जब घरवाले उठे, तो चारों ओर गंदगी फैली हुई थी। घर में दुर्गंध थी, लेकिन कहीं भी सोना नहीं था। जेठानी गुस्से में देवरानी के पास पहुंची। देवरानी ने शांत स्वर में कहा बहन, तुमने गरीबी का नाटक किया था। मेरे पास सच में कुछ नहीं था, इसलिए सकट माता को दया आ गई। तुमने छल किया, इसी कारण माता नाराज हुईं।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।