श्रीकृष्ण ने वायुदेव से क्यों कही 7 रात रुकने की बात?
विष्णु पुराण के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात भगवान कृष्ण ने कई वर्षों तक द्वारका पर राज किया। इसी दौरान एक दिन वायुदेव श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उन्हें एकांत में प्रणाम करते हुए कहा कि हे भगवन आपके बैकुंठ वापस लौटने का समय आ चुका है। आप वहां पहुंचकर देवताओं को सनाथ करें। आपको पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए सौ वर्ष से अधिक हो गए हैं। ऐसे में यदि आपको सही लगे तो अब बैकुंठ लौट जाइए। लेकिन अगर आपको यहां रहना अच्छा लगे तो रह सकते हैं। वायुदेव की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए बताया कि तुम्हारी बात बिल्कुल ठीक है और मैं यह जानता हूं। लेकिन मुझे अभी यदुवंशियों का नाश करना है। उनका संहार किए बिना अभी पृथ्वी का भार हल्का नहीं हुआ है। अगले 7 रात्रि में मैं उनका संहार करके वापस लौट आऊंगा और इसी दौरान पूरी द्वारका समुद्र में समा जाएगी। यह बात जानने के बाद वायुदेव वापस लौट गए।
श्रीकृ्ष्ण ने त्यागा देह, यदुवंशियों का हुआ संहार
अगली 7 रातों में ऐसा ही हुआ और भगवान श्रीकृष्ण ने कुछ ऐसी लीला रचाई की यदुवंशियों का विनाश हो गया और भगवान ने अपने देह का त्याग कर दिया। श्रीकृष्ण ने पहले ही अर्जुन को यह संदेश भिजवा दिया था की अगले 7 दिनों में पूरी द्वारका समुद्र में समा जाएगी। ऐसे तुम महिलाओं और द्वारिका के धन को लेकर वहां से निकल जाना। यह संदेश मिलते ही अर्जुन श्रीकृष्ण को ढूंढने निकल गए। लेकिन तब तक श्रीकृष्ण अपना देह त्याग चुके थे। विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की 8 पटरानियों ने उनका देह गोद में लेकर अग्नि समाधि ले ली। पुराणों के मुताबिक, श्रीकृष्ण की 16 हजार 108 पटरानियां थी जिनमें से 8 मुख्य थीं। पृथ्वी पर जो भी जीव जिस भी देह को धारण करके आया हो उसे वह अंत में त्यागना ही पड़ता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने अपना देह त्यागा और वापस बैकुंठ लौट गए।
श्रीकृष्ण की अन्य पटरानियों का क्या हुआ, अर्जुन क्यों करने लगे विलाप
अंतिम संस्कार करने के पश्चात अर्जुन ने सभा भुलाई और सभी को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए द्वारका के समुद्र में समा जाने की बात कही। इसके पश्चात अर्जुन ने कहा की सभी तैयार हो जाओ अब हमें यहां से निकलना होगा। अर्जुन सभी पटरानियों, अन्य कन्याओं और वज्र जो श्रीकृष्ण के पोते और मथुरा के राजा थे उनके साथ वहां से विदा होने लगे तो समुद्र उछाल मारने लगा। लेकिन उस समय समुद्र भय से भगवान कृष्ण के भवन को नहीं डुबाता क्योंकि उसमें श्रीकृष्ण खुद निवास करते थे। उस समय स्त्रियों और धन को अर्जुन द्वारा ले जाते देख लुटेरों को लोभ उत्पन्न हुआ। तब उन्होंने वहां जाकर आक्रमण कर दिया। उस समय ऐसा संयोग बना कि अर्जुन अपने गाण्डीव धनुष को उठा तक न सके और उनकी मंत्र शक्तियों ने काम करना बंद कर दिया। तब लुटेरों ने सारा धन और स्त्रियों को अपने अधीन कर लिया। तब अर्जुन विलाप करने लगे और विलाप करते हुए व्यासजी के पास पहुंच गए।
व्यासजी ने बताया लुटेरों द्वारा धन और स्त्री हरण का रहस्य
व्यासजी के पास पहुंचकर अर्जुन ने सारी बात उन्हें कह सुनाई। सब कुछ जानकर व्यासजी ने उत्तर दिया की तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। जो भी तुमने बताया वो सब सत्य है और ऐसा ही होना था। लुटेरों द्वारा धन और स्त्री के हरण होने का जो रहस्य है वो मैं बताता हूं। पूर्व काल में अष्टावक्रजी सनातन ब्रह्म की स्तुति करते हुए कई वर्षों तक जल में रहे थे। तभी दैत्यों पर विजय प्राप्त करके देवताओं में सुमेरु पर्वत पर एक महान उत्सव रखा। वहां जाते हुए मार्ग में कई हजार देवांगनाओं ने मार्ग में उन मुनिवर को देखा उनकी स्तुति करने लगीं। उन्होंने जटाधारी मुनिवर को कंठ तक जल में डूबे देखकर विनयपूर्वक स्तुति की। उनसे प्रसन्न होकर अष्टावक्रजी बोले मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो वो मुझसे कहो दुर्लभ होने पर भी मैं उसे पूरा करुंगा। तब उनमें से बहुतों ने श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने का वर मांगा। विष्णु पुराण के अनुसार, अष्टावक्रजी ऐसा ही होगा कहते हुए जब जल से बाहर निकले तो अप्सराओं ने उनके आठ स्थानों में टेढ़े कुरूप देह को देखा। उसे देखकर अप्सराओं को हंसी आ गई जो छिपाने पर भी न छिपी। इससे क्रोधित होकर अष्टावक्रजी ने श्राप दिया की मेरी कृपा से तुम भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त तो करोगी लेकिन मेरे शाप से लुटेरों के हाथों पकड़ी जाओगी। यही कारण है कि द्वारका से विदा लेते समय ऐसा संयोग बना जिससे अर्जुन भी उन्हें नहीं बचा सके।














