बुधवार को टीएमसी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया एक्स अकाउंट से एक वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने इशारों-इशारों में बीजेपी पर पहले से वोटर लिस्ट फॉर्म भरकर वोटर के नाम कटवाने के आरोप लगाए। वीडियो के कैप्शन में लिखा, ‘जब पहले से भरे हुए नाम हटाने के फॉर्म कार्गो की तरह ले जाए जाते हैं, तो इससे बांग्ला विरोधी पार्टी की वह मानसिकता उजागर होती है जो मतदाताओं को नागरिक नहीं बल्कि समस्या मानती है।’
बीजेपी ने किया पलटवार?
इस वीडियो को बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी और अमित मालवीय ने शेयर करते हुए टीएमसी पर पलटवार किया है। प्रदीप भंडारी ने कहा कि आपके दावे आपके ही फैक्ट पर धराशाई होते हैं। उन्होंने कहा यदि आपको एसआईआर की सही सूची पर भरोसा है तो मतदाता सूची अधिकारी बार-बार फॉर्म-7 भरने से क्यों रोक रहे हैं?
प्रदीप भंडारी ने आरोप लगाता कि कुमारग्राम विधानसभा क्षेत्र में ईआरओ ने फॉर्म 7 को स्वीकार करने से मना कर दिया और कारण पूछे जाने पर कुछ नहीं बोला। जबकि भटपारा विधानसभा क्षेत्र में आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के आने से ठीक 10 मिनट पहले ईआरओ वहां से निकल गया, जिससे फॉर्म 7 नहीं जमा हो सका। बीजेपी नेता ने कहा कि टीएमसी को यह डर है कि फॉर्म 7 के स्वीकार और वेरिफाई होने के बाद उसकी चुनावी धांधली बंद हो जाएगी।
ERO ने फॉर्म-7 स्वीकार करने से किया मना- अमित मालवीय
वहीं बीजेपी आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने आरोप लगाते हुए कहा, बेहाला पुरबा में ERO रीना घोष ने हमारे मंडल अध्यक्ष और बीएलए-1 द्वारा किए गए फॉर्म 7 को स्वीकार करने से मना कर दिया, अधिकारी ने इसका कोई वैध कारण भी नहीं बताया।
मालवीय ने वीडियो शेयर करते हुए आरोप लगाया कि रीना घोष ने ‘अपने वैधानिक कर्तव्य का पालन करने के बजाय वह निर्देश लेने के बहाने फोन कॉल करते हुए चली गई, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के पास ईआरओ कार्यालय में धरना देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
एसआईआर से कटे 58 लाख नाम
एसआईआर के पहले चरण के पूरा होने के बाद 16 दिसंबर को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई, यानी पूरे राज्य में 58 लाख से अधिक नाम हटाए गए। निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के अनुसार, पहले चरण में नाम हटाने के कारणों में मृत्यु, स्थायी पलायन, दोहराव और गणना फॉर्म जमा न करना शामिल था।
एसआईआर का दूसरा चरण फिलहाल जारी है, जिसमें 1.67 करोड़ मतदाताओं की सुनवाई हो रही है। इनमें 1.36 करोड़ मतदाता तार्किक विसंगतियों के कारण जांच के दायरे में हैं और लगभग 31 लाख ऐसे मतदाता हैं, जिनके रिकॉर्ड की सही ढंग से मैपिंग नहीं हो पाई है।














