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  • Success Story: बिहार के छोरे ने ‘गरीबों के खाने’ को दिलाई ग्लोबल पहचान, पीएम मोदी तक पहुंची थाली

    नई दिल्ली: बिहार के मुंगेर जिले में एक जगह है जमालपुर। इस शहर की संकरी गलियों और रेल इंजन की सीटी के बीच पले-बढ़े गौतम कुमार ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके बनाए व्यंजन प्रधानमंत्री, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों और अरबपतियों की थाली तक पहुंचेंगे। लेकिन यह सफर सिर्फ सफलता का नहीं, बल्कि


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    By Azad Hind Desk फरवरी 12, 2026
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    नई दिल्ली: बिहार के मुंगेर जिले में एक जगह है जमालपुर। इस शहर की संकरी गलियों और रेल इंजन की सीटी के बीच पले-बढ़े गौतम कुमार ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनके बनाए व्यंजन प्रधानमंत्री, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों और अरबपतियों की थाली तक पहुंचेंगे। लेकिन यह सफर सिर्फ सफलता का नहीं, बल्कि पहचान, संघर्ष और जड़ों को अपनाने की कहानी है।

    गौतम बताते हैं कि बचपन में वे हर सुबह अपने गांव से कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे। उस समय उनके भीतर हमेशा एक कमी का एहसास रहता था- जैसे वे कहीं फिट नहीं बैठते। यह भावना उनके साथ लंबे समय तक रही, खासकर तब जब उन्होंने शेफ बनने का फैसला किया। उस दौर में खाना बनाना अक्सर महिलाओं का काम माना जाता था और एक छोटे शहर के लड़के का कुकिंग को करियर बनाना असामान्य समझा जाता था।
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    ‘बिहारी’ पहचान के साथ किया गया जज

    गौतम सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने के लिए खाना बनाना चाहते थे। जब वे पहली बार बिहार से बाहर प्रोफेशनल किचन में पहुंचे तो उन्हें अपनी बोली, खानपान और पृष्ठभूमि के कारण ‘बिहारी’ पहचान के साथ जज किया गया। बिहार के खाने को अक्सर साधारण या ‘अनसोफिस्टिकेटेड’ माना जाता था और लंबे समय तक उन्होंने खुद को उसी ढांचे में फिट करने की कोशिश की।

    फाइव-स्टार होटलों में काम करते हुए गौतम ने कॉन्टिनेंटल डिश, इंटरनेशनल प्लेटिंग और आधुनिक तकनीकों पर महारत हासिल की। शांगरी-ला, द इम्पीरियल, ग्रैंड हयात, रेडिसन और मेफेयर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम ने उन्हें अनुशासन, नेतृत्व और विश्वसनीयता दी। लेकिन भीतर एक बेचैनी बनी रही- वे उस भोजन संस्कृति से दूर होते जा रहे थे जिसने उन्हें बनाया था। यही बेचैनी आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

    शुरू किया जड़ों को अपनाना

    समय के साथ गौतम ने अपनी जड़ों को अपनाना शुरू किया। बाजरा, पारंपरिक अनाज, सात्विक व्यंजन, स्थानीय सब्जियां और कम मसालों वाला भोजन अब उनके किचन की पहचान बन गए। उन्होंने सवाल उठाया कि हमारे पूर्वजों का भोजन, जो पोषण और पर्यावरण दोनों के लिहाज से बेहतर है, उसे हीन क्यों समझा जाता है?

    साल 2023 में साल्ट कैटरिंग के डायरेक्टर सम्मीर एस गोगिया के साथ काम करते हुए गौतम ने एक नया प्रयोग शुरू किया- क्यूरेटेड आयुर्वेदिक मेनू। भारी, तैलीय और दिखावटी पार्टी खाने की जगह उन्होंने सात्विक सिद्धांतों, मौसमी सामग्री और पाचन संतुलन पर आधारित व्यंजन पेश किए। A2 घी और मसालों के तापमान से लेकर समय तक, हर चीज सोच-समझकर तय होती है।

    वैश्विक मंच तक पहुंचा प्रयोग

    गौतम की सोच जल्द ही अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची। साल 2023 में दिल्ली के यशोभूमि में हुए G20 समिट में गौतम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और G20 प्रतिनिधियों को बाजरा-आधारित मेनू परोसा। उनके लिए यह सिर्फ एक पेशेवर उपलब्धि नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीत थी। एक ऐसा अनाज जिसे कभी ‘गरीबों का खाना’ कहा जाता था, वही अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की मेज पर था।

    इसके बाद साल 2025 में जयपुर में IIFA सिल्वर जुबली में उनके बाजरा-आधारित व्यंजनों ने भारतीय देहाती खानपान को ग्लोबल मंच पर नई पहचान दी। मुंबई और उदयपुर की हाई-प्रोफाइल शादियों में भी उनके सात्विक और आयुर्वेद-केंद्रित स्टॉल चर्चा का विषय बने, जहां अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने उनके व्यंजनों का स्वाद लिया।

    संस्कृति पर भरोसा रखने का संदेश

    आज शेफ गौतम कुमार भारतीय पाक नेतृत्व के नए चेहरे के रूप में उभरे हैं- जो ट्रेंड्स का अंधाधुंध पीछा नहीं करते, बल्कि परंपरा को आधुनिकता से जोड़ते हैं। वे मानते हैं कि असली विलासिता आयातित सामग्री में नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति पर भरोसा रखने में है। जो लड़का कभी ‘बहुत बिहारी’ होने के कारण खुद को अलग महसूस करता था, आज वही अपनी पहचान पर गर्व करता है। उसकी हर प्लेट में सादगी, पोषण और जड़ों की ताकत झलकती है।

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