द वॉर जोन ने कहा है कि अमेरिका के मिलिट्री प्लानर्स ने हमले से पहले तैयारी के लिए कुछ समय मांगा है। ऐसा इसलिए क्योंकि ईरान फिर इजरायल और मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिका के दूसरे सैन्य ठिकानों पर एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला शुरू कर देगा। अमेरिकी अधिकारी ईरान पर एक बार में ही भीषण हमला कर स्थिति को पूरी तरह से अपने कंट्रोल में करना चाहते हैं, वो किसी लंबी चलने वाली लड़ाई में नहीं फंसना चाहते हैं और अभी असरदार हमले की तैयारी की जा रही है। फिलहाल वाइट हाउस ने कहा है कि 800 प्रदर्शनकारियों के फांसी रोके जाने के बाद हमला करने का इरादा टाल दिया गया है।
ईरान पर क्या अमेरिकी हमला होकर रहेगा?
सवाल ये है कि अगर अमेरिका और इजरायल का मकसद ईरान में सत्ता परिवर्तन है, तो बिना हमला किए वो संभव नहीं है। ईरान में 28 दिसंबर से शुरू हुए इस प्रदर्शन की रफ्तार अब धीमी पड़ने लगी है। करीब 4000 लोग मारे गये हैं। इसीलिए सवाल अहम हो जाता है कि अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाना चाहता है या नहीं और हमला होगा या नहीं, वो इसी सवाल पर निर्भर करता है। अगर अमेरिका मिलिट्री ऑपरेशन के साथ जाने का फैसला करता है तो उसके पास कई तरह के ऑप्शन हैं। जैसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) की सेना और उनके बासिज पैरामिलिट्री सैनिकों पर एक ही बार में घातक सर्जिकल स्ट्राइक। दूसरा ऑप्शन ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ साथ ईरान की सरकार के उच्च अधिकारियों पर हमला या फिर से न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला करना। इसके अलावा, ईरान की जवाबी कार्रवाई को धीमा करने के लिए उसके मिसाइल कारखानों, अंडरग्राउंड मिलिट्री ठिकानों पर हमला करने का ऑप्शन हो सकता है।
कुछ रिपोर्ट्स में तो ये भी दावा किया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप से ईरान पर हमला नहीं करने का आग्रह किया है। क्योंकि पिछले साल जून की लड़ाई में कम से कम 50 एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलें इजरायल में गिरी थीं, जिसका घातक असर हुआ था। हमले की स्थिति में ईरान इस बार भी वैसा ही कर सकता है। हालांकि अभी भी अमेरिका के पास इस इलाके में टैक्टिकल एयरक्राफ्ट, छह जंगी जहाज और करीब 30,000 सैनिक हैं। लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि वो ईरान के खिलाफ किसी बड़े, लगातार चलने वाले ऑपरेशन के लिए तैयार है। वो अभी ईरान की एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलों को सौ फीसदी रोकने की भी स्थिति में नहीं है। डिफेंस एक्सपर्ट टायलर रोगोवे ने X पर लिखा है कि “मिडिल ईस्ट में इतने एसेट्स नहीं हैं कि ईरान में कुछ बड़ा करने के लिए, एक लगातार कैंपेन चलाया जा सके। यह कभी सवाल ही नहीं था।”
क्या हमले के बाद ईरान को संभाल पाएगा अमेरिका?
टायलर रोगोवे ने ये भी सवाल उठाया है कि अगर अमेरिका हमला करता है और शीर्ष नेताओं को मार देता है, तो उसके बाद जो स्थिति बनेगी, क्या अमेरिका के पास उस हालात को संभालने की क्षमता है? और अगर सरकार को खत्म करने वाला हमला कामयाब नहीं हुआ तो क्या होगा? इसके बाद जो हो सकता है, उसके लिए बड़ी इमरजेंसी योजनाओं की जरूरत होगी, क्या अमेरिका एक छोटे समय में ऐसा कर सकता है? उनका कहना है कि कई एयरक्राफ्ट कैरियर और 100 से ज्यादा फाइटर जेट्स, दर्जनभर पनडुब्बियां देखने में एक विशालकाय बेड़ा लगता है, लेकिन सवाल ये है कि क्या वो एक देश को संभालने में सक्षम हैं या फिर हमला कर टॉप लीडरशिप को मिटाकर भाग जाना विकल्प बनेगा। और अगर ऐसी स्थिति बनती है तो ईरान के हालात भयावह हो सकते हैं।
अमेरिका ने अभी अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस क्षेत्र में भेज दिया है, जो एक हफ्ते में मिडिल ईस्ट पहुंच जाएगा। इसके CVW-9 कैरियर एयर विंग में आठ स्क्वाड्रन हैं जो F-35C लाइटनिंग II लड़ाकू विमान, F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट, EA-18G ग्राउलर, E-2D हॉकआई, CMV-22B ऑस्प्रे और MH-60R/S सी हॉक से लैस हैं। इसके साथ चलने वाले, टिकोनडेरोगा क्लास गाइडेड-मिसाइल क्रूजर USS मोबाइल बे और डिस्ट्रॉयर स्क्वाड्रन (DESRON) 21 के अर्ले बर्क क्लास गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर बड़ी संख्या में मिसाइल ट्यूब से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमला करने के लिए किया जा सकता है। इन जहाजों का इस्तेमाल जवाबी कार्रवाई के दौरान अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगियों के ठिकानों की रक्षा के लिए भी किया जा सकता है।
इसके अलावा जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश कैरियर ग्रुप के भी इस इलाके में जाने की रिपोर्ट है, जिसकी पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। यह एयरक्राफ्ट कैरियर कैरियर 13 जनवरी को अपने होमपोर्ट नॉरफॉक से निकला था। फिलहाल अमेरिकी नौसेना ने किसी भी जहाज की आवाजाही को लेकर टिप्पणी करने से मना कर दिया है, जबकि मिडिल ईस्ट में मिलिट्री ऑपरेशन करने के जिम्मेदार, CENTCOM ने भी इस इलाके में किसी भी एसेट की आवाजाही के बारे में बात करने से मना कर दिया है।
अमेरिकी वायुसेना भी मिडिल ईस्ट में एक्टिव
नौसेना के अलावा इस क्षेत्र में एक दर्जन से ज्यादा कार्गो जेट मिडिल ईस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। ये शायद सप्लाई चेन को बनाए रखने के लिए जा रहे होंगे। ऐसे भी संकेत मिले हैं, कि इस इलाके में यूरोपियन मिलिट्री एयरक्राफ्ट की संख्या बढ़ रही है। ऑनलाइन फ्लाइट ट्रैकर्स से पता चलता है कि कम से कम चार रॉयल एयर फोर्स यूरोफाइटर टाइफून फाइटर और एक एयरबस KC-2 वॉयजर एरियल रिफ्यूलिंग जेट शायद बहरीन की तरफ जा रहे हैं। हालांकि, हमें पक्का नहीं पता कि इसका ईरान पर किसी प्लान किए गए हमले से कोई लेना-देना है या नहीं। हो सकता है ये उस इलाके में सामान्य मूवमेंट भी हो सकते हैं। जॉर्डन में मुवफ्फाक अल साल्टी एयर बेस के ऊपर एक RAF प्रोटेक्टर RG Mk 1 (MQ-9B) ड्रोन दिखाई दिया। RAF ने इन गतिविधियों पर प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया है। ऐसा लगता है कि फ्रांस और जर्मनी भी इस इलाके में हवाई जहाज भेज रहे हैं। वॉर जोन के मुताबिक, जर्मन और फ्रांसीसी अधिकारियों ने भी इस पर बात करने करने से मना कर दिया है।














