लेकिन न्यू यॉर्क की छोटी वाइन आयातक कंपनी VOS Selections के मालिक विक्टर श्वार्ट्ज आगे आए। ट्रंप के व्यापक टैरिफ के खिलाफ कानूनी लड़ाई का चेहरा वही बने और आखिरकार जीत भी हासिल की। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उनके पक्ष में फैसला सुनाया। VOS Selections 16 देशों से वाइन और स्पिरिट्स आयात करती है। ट्रंप ने जब लगभग हर अमेरिकी व्यापारिक भागीदार पर व्यापक रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए तो कई इम्पोर्ट पर निर्भर व्यवसायों की तरह VOS Selections भी सीधे तौर पर प्रभावित हुई। इन टैरिफ के कारण कंपनियों को अपने उत्पादों को बेचने से पहले भारी शुल्क चुकाना पड़ता था।
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शुरुआत में हिचक रहे थे श्वार्ट्ज
CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, फैसले के बाद श्वार्ट्ज ने कहा कि शुरुआत में वह इतने बड़े रोल को लेकर हिचक रहे थे। उन्होंने कहा, मामले में शामिल होना एक बात थी, लेकिन मुख्य याचिकाकर्ता बनना मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा था। श्वार्ट्ज का कहना है कि छोटे कारोबारी बड़े कॉरपोरेट्स की तरह टैरिफ का बोझ नहीं उठा सकते। उन्होंने कहा, हम अपनी कीमतें बस यूं ही नहीं बढ़ा सकते और न ही बड़े कॉरपोरेट्स की तरह चेक लिखकर भुगतान कर सकते हैं। उनके मुताबिक, अप्रैल से अब तक उन्हें कम से कम छह अंकों (लाखों डॉलर) की राशि टैरिफ के रूप में चुकानी पड़ी है।
आसान नहीं रही जीत
14 अप्रैल 2025 को याचिका दायर की। बाद में इसे दूसरी याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक आपातकालीन टैरिफ अवैध है। हालांकि यह जीत श्वार्ट्ज के लिए व्यक्तिगत रूप से आसान नहीं रही। उन्होंने कहा, मुझे लगातार टेक्स्ट और ईमेल के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। यह रुक नहीं रहा। माहौल थोड़ा बदसूरत है। हम दफ्तर के दरवाजे बंद रख रहे हैं। इस फैसले के बाद श्वार्ट्ज और अन्य आयातकों को बड़ी रकम की वापसी मिल सकती है।
सरकारी नीतियों को चुनौती
यह मामला विक्टर श्वार्ट्ज के लिए एक महत्वपूर्ण जीत थी। एक छोटे व्यवसाय के मालिक के रूप में उन्होंने दिखाया कि कैसे आम लोग भी बड़ी सरकारी नीतियों को चुनौती दे सकते हैं, खासकर जब वे अनुचित या अवैध हों। उनके व्यवसाय को सीधे तौर पर इन टैरिफ से नुकसान हो रहा था। जब ट्रंप प्रशासन ने ये टैरिफ लगाए, तो इसका मतलब था कि श्वार्ट्ज को अपनी वाइन अमेरिका में बेचने से पहले ही अतिरिक्त पैसे चुकाने पड़ते थे। यह छोटे व्यवसायों के लिए एक बहुत बड़ा बोझ था, क्योंकि उनके पास अक्सर बड़े निगमों की तरह बहुत सारा पैसा नहीं होता।













