गतिरोध बढ़ा। और हालात ऐसे बने कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना चर्चा के ही पारित हो गया। सोमवार से बजट पर चर्चा शुरू होनी थी, लेकिन सदन में गतिरोध बना रहा।
कितनों को मिलेगा रोजगार
जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब से सामने आई बातों में अग्निपथ योजना का जिक्र भी है। इस मसले पर राजनीति भले किसी भी दिशा में जाए, लेकिन असली परीक्षा तो इस साल के अंत में अग्निपथ योजना की भी होनी है, जब पहला बैच सेवा पूरी कर बाहर आएगा। सबसे पहले नेवी के अग्निवीर बाहर आएंगे। इसी साल नवंबर में नेवी के पहले बैच के करीब 2600 अग्निवीरों के चार साल पूरे हो रहे हैं। अगले साल की शुरुआत में फिर आर्मी और एयरफोर्स के अग्निवीरों का पहला बैच बाहर आएगा।
- अभी तक लागू स्कीम के मुताबिक, अग्निवीरों में से 25% परमानेंट होंगे और बाकी बाहर हो जाएंगे। यहीं से अग्निपथ योजना की असली अग्निपरीक्षा शुरू होगी। सबसे बड़ा सवाल है कि बाहर होने वाले 75% युवाओं को आगे कितना और किस तरह का रोजगार मिल पाता है। सरकार का दावा है कि इसके पूरे इंतजाम हैं।
- CAPF सहित कई राज्य सरकारों ने पुलिस में अग्निवीरों के लिए कुछ कोटा निर्धारित किया है। जब से अग्निपथ स्कीम लागू हुई है, तबसे ये सवाल
- लगातार उठ रहा है कि सिर्फ 25% अग्निवीरों को ही परमानेंट करना पर्याप्त नहीं है। तीनों सेनाओं की तरफ से भी सिफारिश की गई थी कि कम से कम
- 40 से लेकर 50 और कुछ मामलों में तो 70% तक अग्निवीरों को परमानेंट किया जाना चाहिए।
- सवाल यह है कि क्या सरकार 25% से अधिक अग्निवीरों को स्थायी करने पर विचार कर रही है। पहले बैच के बाहर आने के बाद इस पर चर्चा हो
- सकती है कि क्या और किस तरह के बदलाव जरूरी हैं। सरकार की ओर से इस तरह के संकेत दिए गए हैं कि अग्निवीरों का चार साल का कार्यकाल बढ़ाने पर विचार नहीं है। लेकिन रिटेंशन रेट, यानी कितने अग्निवीरों को स्थायी करना है, इसमें जरूरी बदलाव का अभी मौका है? स्कीम में इस तरह का बड़ा बदलाव अगर पहले बैच में ही कर दिया जाएगा तो ये सरकार की आगे की सरदर्दी को ही कम करेगा।
बदलाव का अवसर
अगर पहले बैच से सिर्फ 25% को ही परमानेंट किया जाता है और फिर आगे जाकर इसमें बदलाव होता है और दूसरे या उसके आगे के बैच से ज्यादा
अग्निवीरों को परमानेंट किया जाता है तो ये फिर कोर्ट केस की ही बाढ़ लगाएगा। रक्षा मंत्रालय वैसे ही कई केस लड़ रहा है और बार-बार कहा जाता है कि अपने ही लोगों के खिलाफ और उन लोगों के खिलाफ रक्षा मंत्रालय लड़ रहा है जो देश सेवा कर रहे हैं, या कर चुके हैं। अग्निवीर अगर वीरगति को प्राप्त होते हैं या डिसएबल्ड (विकलांग) तो उन्हें और उनके परिवार को रेगुलर सैनिकों की तरह ही मदद की भी सेना सिफारिश कर चुकी है। ये मसला भी पेंडिंग है। अग्निपथ योजना पर राजनीतिक बहस अपनी जगह है, लेकिन इसकी असली कसौटी अब ज्यादा दूर नहीं।













