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  • अफ्रीका में चीन की ‘घेराबंदी’, 32 देशों में बनाया नौसैनिक अड्डा, क्या हिंद महासागर में भारत के लिए बढ़ेगा खतरा?

    बीजिंग: चीन अपनी नौसैनिक क्षमता का तेजी से बढ़ा रहा है। इसके लिए उसने अफ्रीका महाद्वीप को एक सैन्य अड्डे के रूप में चुना है। चीन ने अफ्रीका के 32 देशों में अपने युद्धपोतों के लिए बंदरगाहों का नेटवर्क तैयार किया है। इनमें से कई बंदरगाह चीनी सरकारी कंपनियां चला रही हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से


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    By Azad Hind Desk फरवरी 4, 2026
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    बीजिंग: चीन अपनी नौसैनिक क्षमता का तेजी से बढ़ा रहा है। इसके लिए उसने अफ्रीका महाद्वीप को एक सैन्य अड्डे के रूप में चुना है। चीन ने अफ्रीका के 32 देशों में अपने युद्धपोतों के लिए बंदरगाहों का नेटवर्क तैयार किया है। इनमें से कई बंदरगाह चीनी सरकारी कंपनियां चला रही हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि चीन ने पिछले एक दशक में पूरे अफ्रीका महाद्वीप में बंदरगाहों का कैसा जाल बिछा लिया है। इसमें नाइजीरिया के लेक्की से लेकर केन्या के मोम्बासा तक शामिल हैं। इससे हिंद महासागर में भारत की भी टेंशन बढ़ सकती है, क्योंकि चीन रिंग ऑफ पर्ल के जरिए पहले ही जाल बिछा चुका है। ऐसे में चीन की नजर अमेरिकी सैन्य प्रभुत्व को चुनौती देने पर है।

    चीन की सरकारी कंपनियां चला रही बंदरगाह

    द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका महाद्वीप में चीनी पैसों से बने बंदरगाहों को बीजिंग की सरकारी कंपनियां चलाती हैं। इन बंदरगाहों को न केवल व्यापार, बल्कि युद्धपोतों को ठहराने के लिए भी डिजाइन किया गया है। कई सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि चीन इस विस्तार से नौसैनिक अड्डों का एक नेटवर्क बना रहा है, जो स्वेज नहर जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों के पास युद्धपोतों को तैनात करने और वैश्विक नौवहन को रोकने में काम आ सकता है।

    अफ्रीका में चीनी बंदरगाह से दुनिया को खतरा क्यों

    अफ्रीका में बने ये बंदरगाह चीन को तांबा और कोबाल्ट जैसी महत्वपूर्ण सामग्री तक पहुंच भी प्रदान करते हैं, जो लड़ाकू विमानों से लेकर स्मार्टफोन तक हर आधुनिक तकनीक के लिए महत्वपूर्ण हैं। अफ्रीका में बने कई बंदरगाह चीन निर्मित रेल और सड़क परियोजनाओं के माध्यम से खदानों से जुड़े हैं। ये चीन के दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के बाजार में वर्चस्व का समर्थन करते हैं और अमेरिका के खिलाफ एक खास ताकत प्रदान करते हैं। रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से बताया गया है कि इन बंदरगाहों के माध्यम से चीन इससे गुजरने वाले सामान और संवेदनशील कार्गो की निगरानी कर सकता है।

    अमेरिका की विदेश नीति से चीन को मिला मौका

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप “गनबोट कूटनीति” की ओर बढ़ रहे हैं। इनमें प्रमुख रणनीतिक संपत्तियों पर शक्ति के दम पर नियंत्रण हासिल करना शामिल है। इसके अलावा वह अमेरिकी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए दोस्तों को भी धमकाने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे की धमकी देना है। ट्रंप लगातार कर रहे हैं कि उन्हें ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं है। उन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी करार दिया है। अमेरिका ने वेनेजुएला, रूस और ईरानी तेल ले जाने वाले दर्जनों टैंकरों को जब्त किया है।

    अफ्रीका के 32 देशों में चीनी बंदरगाह

    पेंटागन से जुड़े एक थिंक टैंक के अनुसार, चीनी सरकारी कंपनियां अब 32 अफ्रीकी देशों में 78 बंदरगाहों पर बिल्डर, फाइनेंसर या ऑपरेटर के रूप में काम कर रही हैं। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में प्लैनेट लैब्स की सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर बताया गया है कि चीन लगाकार अफ्रीका में अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत कर रहा है। चीन ने नाइजीरिया के लागोस में गहरे समुद्र में स्थित लेक्की बंदरगाह में 660 मिलियन पाउंड का निवेश किया है। इस कारण यह पश्चिम एशिया का सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक बन गया है। इसके विशाल डॉक और क्रेन वैश्विक समुद्री व्यापार के कंटेनर से लदे विशाल जहाजों को संभाल सकते हैं।

    हिंद महासागर में भारत की बढे़ंगी मुश्किलें

    चीन अफ्रीका महाद्वीप के जरिए हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को बढ़ा रहा है। वह जिबूती में पहले से ही अपने नौसैनिक अड्डे को ऑपरेट कर रहा है। चीनी युद्धपोत, पनडुब्बियां, जासूसी जहाज लगातार हिंद महासागर में गश्त लगा रहे हैं। चीनी नौसेना न सिर्फ अरब सागर, बल्कि बंगाल की खाड़ी में भी ऑपरेट कर रही है। इससे भारत तीन तरफ से चीनी नौसेना की मौजूदगी को महसूस कर रहा है। अफ्रीका तक जाने वाले चीनी नौसैनिक पोत हिंद महासागर का चक्कर लगाकर पहुंच रहे हैं। इसके अलावा भारतीय नौवहन रूट पर चीनी युद्धपोतों की मौजूदगी भी भविष्य के लिए खतरा बन सकती है।

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