BRICS के ये मेंबर युद्धाभ्यास में ले रहे हिस्सा
अलजजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, BRICS नाम इसके संस्थापक सदस्य देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के शुरुआती अक्षरों से लिया गया है। हालांकि, भारत और ब्राजील ने इन युद्धाभ्यासों में भाग नहीं लिया। इस युद्धाभ्यास में चीन और ईरान ने विध्वंसक पोत भेजे हैं। वहीं, रूस और संयुक्त अरब अमीरात ने कोरवेट भेजे और दक्षिण अफ्रीका ने एक मध्यम आकार का फ्रिगेट तैनात किया है। ब्राजील, मिस्र, इंडोनेशिया और इथियोपिया पर्यवेक्षक के रूप में अभ्यास में शामिल हो रहे हैं। उद्घाटन समारोह में दक्षिण अफ्रीका के संयुक्त कार्य बल के कमांडर कैप्टन नंदवाखुलु थॉमस थमाहा ने कहा कि ये अभ्यास महज एक सैन्य अभ्यास से कहीं अधिक हैं और ब्रिक्स देशों के समूह के बीच एक दृढ़ संकल्प का प्रतीक हैं।
इस युद्धाभ्यास का मकसद क्या है
मेजबान देश दक्षिण अफ्रीका ने इसे ब्रिक्स प्लस अभियान बताया, जिसका मकसद जहाजों की आवाजाही और समुद्री आर्थिक गतिविधियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ब्रिक्स प्लस एक ऐसा विस्तार है जो भू-राजनीतिक समूह को अपने मुख्य सदस्यों के अलावा अन्य देशों के साथ जुड़ने और उन्हें अपने पक्ष में करने में सक्षम बनाता है। ईरान 2024 में इस समूह में शामिल हुआ। साथ ही, इस गुट का विस्तार करते हुए इसमें मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी शामिल किया गया।
बदलती भू-राजनीति में ये अभ्यास महत्वपूर्ण क्यों हैं?
दक्षिण अफ्रीका पहले भी चीन और रूस के साथ नौसैनिक अभ्यास कर चुका है। थामाहा ने कहा-यह एक साथ मिलकर काम करने के हमारे सामूहिक संकल्प का प्रदर्शन है। तेजी से जटिल होते समुद्री वातावरण में इस तरह का सहयोग कोई विकल्प नहीं है, बल्कि यह आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका के रक्षा विभाग ने एक बयान में कहा कि इस वर्ष का अभ्यास ‘सभी भाग लेने वाली नौसेनाओं की समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, साझा परिचालन प्रक्रियाओं को बढ़ाने और शांतिपूर्ण समुद्री सुरक्षा पहलों के समर्थन में सहयोग को गहरा करने की सामूहिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।’
रूसी तेल टैंकर जब्त करने के बाद शुरू हुए
रिपोर्ट के अनुसार, ये अभ्यास अमेरिका द्वारा उत्तरी अटलांटिक में वेनेजुएला से जुड़े एक रूसी तेल टैंकर को जब्त करने के ठीक तीन दिन बाद शुरू हुए, जिसमें अमेरिका ने कहा था कि उसने पश्चिमी प्रतिबंधों का उल्लंघन किया है। यह घटना अमेरिकी सेना द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को राजधानी काराकास से उठाने के बाद घटी। इसके अलावा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर शासन करने और उसके विशाल तेल भंडारों का दोहन करने का वादा भी किया था। ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा, कोलंबिया और ईरान जैसे देशों के साथ-साथ डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड के खिलाफ भी सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है।
ट्रंप ब्रिक्स के कुछ मेंबर को मानते हैं अमेरिका विरोधी
ट्रम्प ने ब्रिक्स के कुछ सदस्यों पर अमेरिका-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया है। जहां वाशिंगटन के चीन और रूस के साथ संबंध अभी भी तनावपूर्ण हैं, वहीं ट्रंप ने ईरान पर हमला किया है और भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं, जिस पर उन्होंने रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध को वित्तपोषित करने का आरोप लगाया है। जनवरी 2025 में पदभार संभालने के बाद ही ट्रंप ने ब्रिक्स के सभी सदस्यों को अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। विकासशील देशों के वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले जुलाई में ट्रंप ने कहा था-जब मैंने ब्रिक्स के इस समूह के बारे में सुना, तो मैंने उन पर बहुत कड़ा प्रहार किया। और अगर वे कभी भी सार्थक रूप से गठित होते हैं, तो यह बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगा। हम किसी को भी हमारे साथ खिलवाड़ नहीं करने देंगे।
भारत पर एकतरफा टैरिफ और ISA से अलगाव
जुलाई में अपने संयुक्त बयान में ब्रिक्स नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया और अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों में वृद्धि पर वैश्विक चिंता व्यक्त की और ईरान पर सैन्य हमलों की निंदा की। ब्रिक्स गठबंधन के दो संस्थापक सदस्य, भारत और ब्राजील इन नौसैनिक अभ्यासों में भाग नहीं ले रहे हैं। दरअसल, ब्रिक्स गैर सैन्य संगठन है। इसका मकसद आर्थिक गठजोड़ को मजबूत करना है।
भारत के साथ अमेरिका का ट्रेड समझौता अभी अधर में
ब्राजीलिया ने पर्यवेक्षक के रूप में अभ्यास में भाग लिया, जबकि नई दिल्ली इससे दूर रही। भारत द्वारा रूस से तेल की खरीद दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में सबसे बड़े तनाव की एक बड़ी वजह है। साथ ही व्यापार समझौता अधर में लटका हुआ है। ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने एक नए विधेयक को मंजूरी दे दी है जो टैरिफ को 500 प्रतिशत तक बढ़ा देगा। हाल ही में अमेरिका ने भारत के नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) से खुद को अलग कर लिया।
भारत ने क्या अमेरिका को खुश करने के लिए बनाई दूरी
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का इन सैन्य अभ्यासों से बाहर रहना अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करने से जुड़ा है। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के भू-राजनीतिक विश्लेषक हर्ष पंत ने बताया। उन्होंने कहा-ये युद्धाभ्यास ब्रिक्स के जनादेश के मुताबिक भी नहीं हैं। ब्रिक्स मूल रूप से एक सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि विकासशील देशों की एक अंतर-सरकारी साझेदारी है जो आर्थिक सहयोग और व्यापार पर केंद्रित है और जिसका उद्देश्य पश्चिम पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। भारत ब्रिक्स के युद्धाभ्यासों में शामिल होना पसंद नहीं करेगा। व्यावहारिक और नैतिक दोनों ही दृष्टियों से भारत इसे आगे नहीं बढ़ा सकता। इसके अलावा, ब्रिक्स प्लस में शामिल देशों जैसे यूएई और ईरान, या मिस्र और ईरान के बीच महत्वपूर्ण मतभेद हैं, जिसके कारण यह गुट एक दुर्जेय सैन्य गठबंधन नहीं बन सकता।














