सीमाओं, सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के संतुलन का है। जस्टिस मेहता ने कहा, अस्पतालों में कुत्तों को अनुमति देने का सुझाव स्वीकार्य नहीं है और दलीलें
जमीनी हकीकत से दूर हैं। कोर्ट ने कथित एंटी-फीडर विजिलेंट द्वारा महिला डॉग फीडरों के उत्पीड़न के आरोपों की जांच करने से भी इनकार कर दिया। कहा, यह
कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला है। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह मामला अब कुत्तों या इंसानों तक सीमित नहीं, बल्कि संवैधानिक शक्तियों सीमाओं का प्रश्न है। डॉग राइट्स (कुत्ता अधिकार) संगठन की ओर से पेश वकील राज शेखर राव ने दावा किया कि सीएसवीआर मॉडल से सुरक्षा मिलती है और कई संस्थानों में कुत्ते व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने संस्थानों को समस्या सुलझाने के लिए 6 महीने का समय देने की मांग की। अदालत ने कहा, यूट्यूब पर ऐसे ‘अनगिनत’ विडियो है, जिनमें कुत्तों को बच्चों और बुजुर्गो पर हमला करते देखा जा सकता है।
सीनियर वकील शादान फरासत ने 6 सुझाव दिए और कहा कि अस्पतालों और मुख्य सड़कों को आवारा कुत्तों से मुक्त करना, फीडर्स और फीडिंग स्थानों की
पहचान, एबीसी नियमों का समयबद्ध क्रियान्वयन, राज्यों द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी दूर करने की योजना, नगर निगम और राज्य सरकार के बीच समन्वय और
हर नगर क्षेत्र में जवाबदेह अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए।
जस्टिस जे. मेहता ने कहा कि अलग-अलग पक्षों की राय अलग हो सकती है, लेकिन संतुलन बनाने का प्रयास सराहनीय है। सीनियर वकील माधवी दिवान ने राज्य स्तर पर ऑनलाइन डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया।














