नई दिल्ली में इस समय जब AI Impact Summit चल रहा है, तब आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। हमें बार-बार याद दिलाया जा रहा है कि AI अब बस मानव बुद्धिमत्ता को पार ही करने वाला है और सुपर-इंटेलिजेंस का दौर आने वाला है। इससे जल्द ही समाज का हर पहलू बदल जाएगा।
बुद्धि क्या है
लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLMs) और जेनरेटिव सिस्टम की प्रगति वाकई प्रभावशाली है। AI निबंध लिख सकता है, अनुवाद कर सकता है, कंप्यूटर कोड तैयार कर सकता है, बीमारियों का निदान सूझा सकता है और यहां तक कि संगीत भी रच सकता है। इससे आवाज की नकल की जा सकती है और किसी दूसरे की पहचान भी अपनाई जा सकती है। मशीनें कुछ खास मामलों में इंसानों को पीछे छोड़ सकती हैं। लेकिन, असली सवाल है कि क्या AI सही में मानव बुद्धि के करीब पहुंच रहा है? जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे लिए इंटेलिजेंस का क्या मतलब है।
पुराना पैमाना
आज AI और इंसानों की जो तुलना की जा रही है, वह गलत धारणा पर आधारित है। यह मान लिया गया है कि बुद्धि सिर्फ दिमाग की वह ताकत है, जिसे परीक्षा या टास्क से नापा जा सकता है। अगर कोई मशीन एग्जाम पास कर ले या अच्छा तर्क लिख दे, तो मान लिया जाता है कि वह इंसान जितनी समझदार हो गई। यह सोच पुराने IQ टेस्ट जैसी है, जिसकी काफी आलोचना होती है। जब हम बुद्धिमत्ता को मापने वाली चीजों तक सीमित कर देते हैं, तो मशीनों के लिए बराबरी करना आसान हो जाता है।
समाज का महत्व
मानव बुद्धिमत्ता कोई व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, यह सामाजिक है। किसी वैज्ञानिक खोज से लेकर कला के क्षेत्र में हुई क्रांति तक, हर इंसानी उपलब्धि सामूहिक प्रयास का नतीजा है। कोई वैज्ञानिक अकेले काम नहीं करता। हर खोज के पीछे साझा तौर-तरीके, रिव्यू, संस्थान और पीढ़ियों का ज्ञान होता है। हमारी परंपराएं भी ऐसे ही चली आ रही हैं और भाषा खुद में सामूहिक उपलब्धि है।
समूह का प्रभाव
कलेक्टिव इंटेलिजेंस पर हुई रिसर्च बताती है कि अगर संवाद और सहयोग प्रभावी हो तो अलग-अलग समूह के लोग साथ काम करते हुए अपनी क्षमता से बढ़कर प्रदर्शन कर सकते हैं। कई बार उनका सामूहिक काम अपने सबसे होशियार सदस्य से भी बढ़िया होता है। हमारी बुद्धिमत्ता परिवारों, समुदायों, संस्थाओं और संस्कृतियों में है। AI इस तरह की किसी सामूहिक दुनिया का हिस्सा नहीं। वह किसी समाज में नहीं रहता, जहां एक-दूसरे से सहयोग चलता हो। वह केवल डेटा के आधार पर रेस्पॉन्स देता है। इसमें कोई समझ, इरादा या जिम्मेदारी नहीं होती।
नैतिकता के सवाल
इंसान की बुद्धि शरीर और अनुभव से जुड़ी होती है। हम बचपन से छूकर, चलकर, देखकर और दूसरों की नकल करके सीखते हैं। हमारी भावनाएं, अनुभव और समाज मिलकर हमारी सोच बनाते हैं। लेकिन, AI के पास न शरीर है, न असली अनुभव। वह सिर्फ बड़े डेटा से शब्दों के पैटर्न सीखता है। वह इंसानों की तरह समझता नहीं, बस गणना करता है। उसे डर, खुशी या सहानुभूति महसूस नहीं होती। वह समाज में रहकर नियम नहीं सीखता। यह कमी नैतिक मामलों में साफ दिखती है। इंसान सही-गलत का फैसला इतिहास , संस्कृति और समाज के आधार पर करता है – मशीनें ट्रेनिंग डेटा के आधार पर।
सीमित डेटा
एक और बात है जिस पर कम ध्यान दिया जाता है कि AI जिस डेटा से सीखता है, वह मानवता का बहुत छोटा-सा हिस्सा है। दुनिया में 7,000 से ज्यादा भाषाएं हैं, लेकिन इंटरनेट का ज्यादातर कंटेंट सिर्फ कुछ बड़ी भाषाओं में है। करीब 80% कंटेंट तो महज 10 भाषाओं में है। संस्कृतियां, मौखिक परंपराएं और तमाम ज्ञान तो मशीन की पहुंच में है ही नहीं। इतने सीमित डेटा पर ट्रेंड AI मॉडल इसीलिए एक छोटी आबादी से जुड़े परिणाम ही दिखाते हैं। इसके विपरीत मानव बुद्धि 8 अरब लोगों के जीवन अनुभव से बनी है। मशीन की इस विविधता तक सीधी पहुंच नहीं। वह इंसानों के बनाए डेटा पर ही निर्भर है, लेकिन यह डेटा भी सीमित है। रिसर्चर्स ने चेताया है कि हम लोग उपलब्ध ट्रेनिंग डेटा की लिमिट तक पहुंचने वाले हैं।
असली खतरा
इन सब बातों का यह मतलब नहीं कि AI गैर-जरूरी है। इसने पहले ही दुनिया को बदल दिया है। असल खतरा यह नहीं है कि मशीनें अचानक से मानवता को पीछे छोड़ देंगी, खतरा है कि कहीं इस शोर में हमारा वास्तविक मुद्दों से ध्यान न भटक जाए। ये मुद्दे हैं- ऑटोमेटेड सिस्टम में पक्षपात, ताकत का केंद्रीकरण, मजदूरों का विस्थापन, नियम और समावेशी तकनीक की जरूरत।
(लेखिका वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी में लैंग्वेज लैब की डायरेक्टर और जेनरेटिव AI थिंक टैंक की डिप्टी हेड हैं)













