इजरायल अक्तूबर 2023 से गाजा में सैन्य ऑपरेशन चला रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस युद्ध पर इजरायल ने 2024 के अंत क 67.5 अरब डॉलर खर्च किए थे। इजरायल की कैबिनेट ने इस साल के लिए करीब 35 अरब डॉलर का बजट मंजूर किया है। गाजा युद्ध के इजरायल की इकॉनमी को बुरी तरह झकझोर दिया है। एक सर्वे के मुताबिक 2024 में वर्कर्स की कमी, लॉजिस्टिक्स की बाधाओं और सुस्ती के कारण करीब 60,000 इजरायली कंपनियां बंद हो गई। इस दौरान देश में पर्यटकों की संख्या में भी गिरावट आई।
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प्रति व्यक्ति जीडीपी
लेकिन ईरान के साथ युद्ध लंबा खिंचता है तो इजरायल की स्थिति और विकट हो सकती है। हालांकि ईरान की तुलना में इजरायल बेहतर स्थिति में है। इजरायल की जीडीपी के 2026 में 666.4 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। इजरायल की आबादी करीब 1 करोड़ और जीडीपी प्रति व्यक्ति करीब 60,000 डॉलर है। दूसरी तरफ ईरान की जीडीपी करीब 375 अरब डॉलर है। इसकी आबादी 9.25 करोड़ और जीडीपी प्रति व्यक्ति करीब 4,000 डॉलर है।
इजरायल की इकॉनमी इनोवेशन, हाई टेक एक्सपोर्ट्स और सर्विसेज पर निर्भर है। दूसरी ओर ईरान की कमाई का सबसे बड़ा जरिया कच्चा तेल है। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों ने पहले से ही ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं। इससे देश की करेंसी की वैल्यू में काफी गिरावट आई है। एक भारतीय रुपये की कीमत 14,434 ईरानी रियाल के बराबर है। देश में महंगाई चरम पर है। ऐसे में इजरायल के साथ लड़ाई लंबी खिंचती है तो ईरान की इकॉनमी पूरी तरह तबाह हो सकती है।
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ईरान की इकॉनमी
ईरान की इकॉनमी पर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड और इस्लामी संगठनों का कब्जा है। वे टैक्स नहीं देते हैं और न ही कोई हिसाब-किताब देते हैं। देश की इकॉनमी में पारदर्शिता नहीं है। जानकारों का कहना है कि ईरान लंबे समय तक इजरायल के साथ युद्ध लड़ने की स्थिति में नहीं है। ईरान की जीडीपी में सर्विस सेक्टर की 47%, इंडस्ट्री की 40% और एग्रीकल्चर की 12.5% हिस्सेदारी है।
देश की इंडस्ट्रियल सेक्टर के सबसे ज्यादा रेवेन्यू ऑयल इंडस्ट्री से आता है। ईरान के तेल निर्यात में चीन की 90% से अधिक हिस्सेदारी है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बावजूद ईरान और चीन के बीच तेल व्यापार पर कोई असर नहीं हुआ है। अगर इजरायल देश के तेल ठिकानों को निशाना बना सकता है तो ईरान की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण ईरान के लोगों के जीवन स्तर में भारी गिरावट आई है और बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं।













