बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि इजरायल सहयोगी देशों का नेटवर्क ‘हेक्सागन एलायंस’ बनाने के प्लान पर काम कर रहा है। इजरायल और सहयोगी देशों का यह एलायंस ‘साझा दुश्मनों’ के खिलाफ मिलकर लड़ेगा। इजरायली पीएम ने अपनी ओर से ही यह ऐलान कर दिया कि भारत इस धुरी का अहम हिस्सा होगा।
भारत के साथ इन देशों का लिया नाम
बेंजामिन नेतन्याहू ने हेक्सागन एलायंस में इजरायल, भारत, ग्रीस, साइप्रस के साथ कुछ अरब, अफ्रीकी और एशियाई देशों के शामिल रहने की बात कही है। नेतन्याहू ने कहा, ‘हमारा मकसद ऐसे देशों का एक ऐसा एलायंस बनाना है, जो शिया और उभरते हुए रेडिकल सुन्नी एक्सिस के खिलाफ एक जैसी राय रखते हों।’
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रस्तावित हेक्सागन को सिर्फ सांकेतिक नहीं माना जा सकता है। यह इजरायल की बड़े डिप्लोमैटिक और सिक्योरिटी ब्लॉक को बनाने की कोशिश को दिखाता है। इसमें इजरायल को दुनिया के एक हिस्से में अलगाव से निकालना भी शामिल है। नेतन्याहू के प्लान में भारत सेंटर में है।
हेक्सागन ऑफ एलायंस क्या है?
नेतन्याहू ने मिडिल ईस्ट के आस-पास हेक्सागन यानी छह-तरफा अलायंस में इजरायल के साथ भारत, भूमध्यसागरीय पार्टनर के तौर पर ग्रीस-साइप्रस और इनके साथ कुछ अरब देश और कुछ अफ्रीकी देश होने की बात कही है। इस गुट में सुरक्षा के अलावा आर्थिक सहयोग और डिप्लोमैटिक अलाइनमेंट पर भी काम होगा।
इजरायल के प्लान में खासतौर से ईरान से उनकी दुश्मनी को देखा जा सकता है। नेतन्याहू ने खुलकर ‘रेडिकल शिया एक्सिस’ और ‘उभरते हुए रेडिकल सुन्नी एक्सिस’ की बात की है। यह एलायंस इन दोनों एक्सिस को तोड़ने का काम करेगा। इजरायल शिया एक्सिस का आधार ईरान को मानता रहा है, जो शिया बाहुल्य देश है।
भारत और इजरायल के रिश्ते
भारत और इजरायल के रिश्ते बीते एक दशक में बेहतर हुए हैं। बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी को अपना दोस्त और भारत को इजरायल का अहम स्ट्रेटेजिक सहयोगी कहा है। नरेंद्र मोदी 2017 में इजरायल जाने वाले पहले भारतीय पीएम थे। पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से कई मौकों पर नेतन्याहू की खूब तारीफ की गई है।
भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंध बेहतर हो रहे हैं। भारत इजराइली डिफेंस इक्विपमेंट के सबसे बड़े खरीदारों में से है। दोनों देश इंटेलिजेंस शेयरिंग और मिलिट्री टेक्नोलॉजी पर मिलकर काम करते हैं। हालांकि इसका ये मतलब कतई नहीं है कि भारत आसानी से इजरायल के बनाए किसी एलायंस का हिस्सा बन जाए।
भारत के सामने क्या होगी दुविधा
नेतन्याहू ने जिस तरह से भारत को प्रस्तावित हेक्सागन ऑफ अलायंस की धुरी बताया, उससे साफ है कि दिल्ली को रिझाने की कोशिश में हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि नेतन्याहू चाहते हैं कि मिडिल ईस्टर्न ऑर्डर के लिए सिक्योरिटी गारंटी में भारत उसके साथ मिलकर काम करे। इसमें फिलिस्तीन और ईरान सबसे अहम नाम हैं।
भारत की अरब और फिलिस्तीन को लेकर दशकों पुरानी नीति रही है। नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद भी भारत उससे दूर जाता नहीं दिखा है। भारत के लिए ईरान विरोधी गुट या फिलिस्तीन को हाशिए पर डालने वाले रीजनल आर्किटेक्चर में शामिल होना बहुत मुश्किल है। भारत के ज्यादातर अरब देशों से पुराने और भरोसे के रिश्ते रहे हैं।
पीएम मोदी सोच-समझकर उठाएंगे कदम
वैश्विक मामलों के जानकारों का कहना है कि नरेंद्र मोदी अगर नेतन्याहू के एलायंस में जाने को भारत के स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी के दशकों पुराना सिद्धांत छोड़ने की तरह देखा जाएगा। भारत किसी भी सूरत में इजरायल के साथ सक्रिय मिलिट्री भूमिका में नहीं दिखना चाहेगा। भारत की पहचान शांति के देश की है तो इजरायल पर वॉर क्राइम के आरोपों की भरमार है। इंटरनेशनल कोर्ट ने नेतन्याहू का भी वारंट जारी किया हुआ है।
भारत को ना सिर्फ मिलिट्री भूमिका पर सोच-समझकर कदम उठाने होंगे बल्कि आर्थिक पहलू को भी देखना होगा। अरब देशों में भारत के लाखों लोग काम करते हैं। भारत की इजरायल के साथ मिलिट्री भूमिका से पश्चिम एशिया में उपजे गुस्से का निशाना भारतीय वर्कफोर्स बन सकती है। इससे भारत को आर्थिक तौर पर बड़ा झटका लगेगा। साफ है कि नेतन्याहू कुछ भी ऐलान अपनी ओर से करें लेकिन भारत इस पर बहुत एहतियात से बढ़ेगा।














