एक हफ्ते तक क्यों टाला गया हमला?- एक्सियोस ने बताया है कि डोनाल्ड ट्रंप के पास दो रास्ते थे। डिप्लोमेसी और जंग। इस एक हफ्ते में अमेरिकी अधिकारियों को अपने प्लान पर काम करने के लिए एक हफ्ते का वक्त और मिल गया, जिसकी प्लानिंग वो पिछले 2 महीने से कर रहे थे। इसीलिए सवाल ये है कि क्या मोदी के दौरे को इजरायल ने एक कवर के तौर पर इस्तेमाल किया है?
ईरान को आखिरी मौका या चकमा?- इस एक हफ्ते में जिनेवा में ईरान के साथ बात की गई ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि ईरान को आखिरी मौका दिया गया था।
पर्दे के पीछे क्या चल रहा था?- दरअसल 17 फरवरी को अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों की दूसरे दौर की बातचीत बिना किसी नतीजे तक पहुंचे खत्म हो गई थी। इसके बाद अमेरिका और इजरायली अधिकारियों ने 21 फरवरी को ईरान पर हमले की तारीख तय कर ली थी।
लेकिन फिर 21 फरवरी को हमला करने के प्लान को टाल दिया गया। अमेरिका और इजरायली अधिकारियों ने कहा कि इसका एक मुख्य वजह उस इलाके में खराब मौसम था। जबकि एक दूसरे इजरायली अधिकारी ने कहा कि हमले में देरी मुख्य रूप से अमेरिका की तरफ से हुई और यह इजरायल डिफेंस फोर्सेज के साथ बेहतर कोऑर्डिनेशन की जरूरत से जुड़ी थी। इसीलिए सवाल और अहम हो जाता है कि क्या मोदी को इसीलिए बुलाया गया ताकि दुनिया का ध्यान युद्ध से भटकाया जा सके और अंदरखाने हमला करने की प्लानिंग की जा सके।
क्या मौसम को लेकर बनाया गया था बहाना?
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि “कुछ लोग कहते हैं कि यह चांद या मौसम या किसी और चीज के बारे में था। लेकिन यह बकवास है।” उन्होंने माना कि “मौसम की बात थी। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि मौसम का मामला इजरायलियों के दिमाग में ज़्यादा था।” एक सीनियर इजरायली अधिकारी के मुताबिक, शुरुआती हमला ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और उनके बेटों के साथ-साथ सीनियर ईरानी अधिकारियों की कई मीटिंग्स को निशाना बनाने के लिए किया गया था जिसमें हर शनिवार को होने वाली एक रेगुलर मीटिंग भी शामिल थी।
दूसरी तरफ अमेरिका में इजरायली राजदूत येचिएल लीटर ने दावा किया कि दो अलग-अलग मीटिंग्स को टारगेट किया गया था। दोनों ही ईरान में चल रहे प्रदर्शन की लहर पर संभावित जवाबों पर फोकस थीं। लेकिन एक हफ्ते की देरी होने से इजरायली और अमेरिकी इंटेलिजेंस के अधिकारी इस बात से ज्यादा घबरा गए थे कि खामेनेई अपने घर से एक अंडरग्राउंड बंकर में चले जाएंगे।
मोदी को बुलाकर क्या युद्ध नहीं होने का संदेश दे रहा था इजरायल?
इजरायल के एक इंटेलिजेंस अधिकारी ने कहा है कि अमेरिका और इजरायल असल में ये सिग्नल देना चाहते थे कि कोई हमला नहीं होने वाला है। ताकि ईरान के सु्प्रीम लीडर सुरक्षित महसूस करें और बंकर में ना जाएं। तो क्या इसीलिए मोदी को बुलाया गया था और एक डिप्लोमेटिक दौरे को कवर के तौर पर इस्तेमाल किया गया था कि हमला नहीं होने वाला है?
ट्रंप प्रशासन के एक सीनियर अधिकारी ने एक्सियोस को बताया है कि यह हैरानी की बात है कि खामेनेई जमीन के नीचे नहीं छिपे थे लेकिन उन्होंने कहा कि “अगर वह जमीन के अंदर भी होते तो हम उन्हें पकड़ लेते।”
हमला करने में एक हफ्ते की देरी से गुरुवार को जिनेवा में होने वाली बातचीत के एक और राउंड के लिए भी जगह बनी। लेकिन इस मीटिंग को क्यों बुलाया गया था इसको लेकर कुछ भी स्पष्ट जवाब नहीं है। एक इजरायली अधिकारी ने कहा कि जिनेवा बातचीत का मकसद हमला करने के लिए एक नई तारीख तय तकना था ताकि ईरानियों को यह यकीन रहे कि डिप्लोमेसी अभी भी ट्रंप का मुख्य रास्ता है। वहीं, दूसरे इजरायली अधिकारी ने कहा कि हमले की नई तारीख टैक्टिकल और ऑपरेशनल वजहों से तय की गई थी और बातचीत असली थी। अगर ट्रंप ने जिनेवा बैठक में ईरानी अधिकारियों में गंभीरता देखी होती तो हमले को और टाल दिया जाता। वहीं दोनों अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात को खारिज किया कि जिनेवा में हुई बैठक असल में एक चाल थी।
जिनेवा बैठक में अमेरिका ने ईरान को क्या प्रस्ताव दिया था?
अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका की तरफ से बातचीत में शामिल ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ किसी डील को लेकर शक में थे। गुरुवार को जब सुबह की बैठक खत्म हुई तो कुशनर और विटकॉफ एक आखिरी अमेरिकी प्रस्ताव लेकर ईरान के पास वापस आए थे। इस प्रस्ताव में ईरानी यूरेनियम एनरिचमेंट पर 10 साल की रोक की मांग शामिल थी। इस दौरान अमेरिका ने ईरान को उसकी नागरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए मुफ्त न्यूक्लियर फ्यूल सप्लाई करने का भी ऑफर दिया था।
ट्रंप की टीम के एक अधिकारी और अमेरिका के एक अधिकारी ने कहा कि अगर ईरानियों ने डील नहीं मानी तो सैन्य इस्तेमाल को लेकर उनके इरादे बिल्कुल साफ थे। कुल मिलाकर हुआ ये कि ईरान ने नये अमेरिकी प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। जिसके बाद अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया।












