यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी के गठबंधन को ‘इस्लामिक NATO’ के विजन की तरफ कदम के तौर पर देखा जा रहा है। यह गठबंधन फाइनल होता है तो यह भारत, इजरायल, आर्मेनिया और साइप्रस जैसे देशों के लिए चुनौती बन सकता है। हालांकि भारत और इजरायल की साझेदारी इसके रास्ते में अहम बाधा बनेगी। दोनों देशों की मजबूत सैन्य और रक्षा साझेदारी है।
भारत-इजरायल संबंध
तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी के गुट के रूप में अगर इस्लामिक नाटो जैसा एक गठबंधन बनता है तो उसके सामने इजरायल और भारत की साझेदारी एक चुनौती बन सकती है। भारत ने 1996 में इजरायल के साथ औपचारिक रक्षा संबंध स्थापित किए। इसके बाद से दोनों देशों के संबंधों में बेहतरी आई है। इजरायल खासतौर से हवाई खतरों के खिलाफ भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में मदद कर रहा है
भारत ने इजरायल से कई सैन्य उपकरण खरीदे हैं, जिनमें बराक नौसैनिक एंटी-मिसाइल रक्षा प्रणाली हासिल की है। भारत को इजरायली हार्पी और मंडराने वाले हारोप किलर लोइटरिंग मिले हैं। इजरायल भारत के स्वदेशी AD सिस्टम का समर्थन कर रहा है, जिसमें एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली शामिल है। भारत के लिए पाकिस्तान के खिलाफ भी इजरायली हथियार मददगार रहे हैं।
तुर्की क्या देख रहा है
सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ नाटो शैली के सैन्य गठबंधन में तुर्की ने शामिल होने का संकेत दिया है। तीनों देशों में हालिया दिनों में इस पर चर्चा हुई है और जल्दी ही इसको लेकर फाइनल ऐलान हो जाने की संभावना है। इसने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक सुरक्षा संतुलन पर नई बहस छेड़ दी है।
सितंबर, 2025 में में सऊदी-पाक रक्षा समझौते की तर्ज पर बना यह संभावित गठबंधन सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर आधारित होगा। भारत के लिए इसमें खासतौर से पाकिस्तान की भूमिका चिंता का विषय है। पाकिस्तान को तुर्की की सैन्य मदद और सऊदी अरब की वित्तीय सहायता किसी टकराव में बहुत मजबूत कर सकता है।













