त्रिजटा की डुबकी
त्रिजटा स्नान को लेकर बहुत सारी मान्यताएं हैं। कुछ श्रद्धालु त्रिजटा स्नान तीन दिन तक न करके एक ही दिन में त्रिजटा के नाम से तीन डुबकी लगाकर इस स्नान को पूर्ण करते हैं। विद्वानों की मानें तो त्रिजटा का अभिप्राय तीन जप अर्थात तीन माह के जप से है। इसके तहत पौष पूर्णिमा का स्नान, उसके बाद माघी पूर्णिमा का स्नान सम्पन्न करके तीसरे माह की तिथि के लिए फाल्गुन में तिथि अनुसार स्नान करने की मान्यता है।
त्रिजटा स्नान की परंपरा
जिस प्रकार ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पापं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किया गया पाप बज्रलेप की भांति कभी नहीं मिटता, उसी प्रकार त्रिजटा स्नान के बाद ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पुण्यं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किए गए पुण्य भी बज्रलेप की भांति कभी क्षय नहीं होते। त्रिजटा स्नान के साथ ही त्रिजटा की परंपरा और संकल्प पूर्ण होता है। सामान्य कल्पवासी भले ही मेला क्षेत्र छोड़ दें, पर कल्पवास के विधान को जानने वाले त्रिजटा स्नान के बाद ही संगम की रेती को प्रणाम करके विदाई लेंगे।
माघ मास में किए गए जप, तप, स्नान की परंपरा में हुई त्रुटि के निमित्त ही तीन तिथियों के अतिरिक्त स्नान की परंपरा है। माघ माह में कल्पवास पूरा करने के बाद भले ही बड़ी संख्या में कल्पवासियों की तंबुओं की नगरी से रवानगी हो गई है पर ‘पूर्ण कल्पवास’ की मान्यता वाले संत, श्रद्धालु ‘त्रिजटा’ स्नान के बाद ही संगम की रेती से विदा लेंगे।














