IIT मद्रास की इस तकनीक को कई तोपों पर परखा गया, जिसमें उनकी स्पीड और पहुंच में स्पष्ट तौर पर बढ़ोतरी देखी गई। परीक्षण में एडवांस्ड टोएड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) की रेंज 40 किमी से बढ़कर 70 किमी हो गई है। इसी तरह, वज्र के-9 गन की रेंज 36 किमी से 62 किमी और धनुष आर्टिलरी गन्स की रेंज 30 किमी से 55 किमी तक बढ़ गई है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित की गई यह तकनीक तोप के गोलों में रैमजेट इंजन लगाती है, जिससे वे बंदूक से निकलने के बाद भी आगे बढ़ते रहते हैं। इससे तोपों की रेंज काफी बढ़ जाती है, लेकिन उनकी मारक क्षमता कम नहीं होती। इस तकनीक के लिए न तो सेना को नई तोपें चाहिए और न ही कोई नया सिस्टम।
कब शुरू हुआ प्रोजेक्ट
आईआईटी मद्रास द्वारा तोप के गोलों को ज्यादा दूरी तक पहुंचाने का यह प्रोजेक्ट 2020 में भारतीय सेना के सहयोग से शुरू हुआ था। इसके तहत तोप के गोलों को बंदूक से निकलते समय कोई नुकसान न हो, वे हवा में स्थिर रहें और रैमजेट इंजन ठीक से काम करें। इन पर नई टेक्नोलॉजी विकसित कर परीक्षण का काम शुरू किया गया था। यह आविष्कार ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत किया गया है। सेना और आईआईटी से सहयोग से विकसित की गई यह टेक्नोलॉजी यह दिखाती है कि कैसे पुरानी प्रणालियों को बेहतर बनाकर कम खर्च में, सुरक्षित और आधुनिक युद्ध के लिए तैयार हथियार बनाए जा सकते हैं।
इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर पीए रामकृष्ण ने किया। उनके साथ लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर (सेवानिवृत्त), प्रो. एचएसएन मूर्ति, प्रो. जी राजेश, प्रो. एम रामकृष्ण, प्रो. मुरूगैयन, लेफ्टिनेंट जनरल हरि मोहन अय्यर (सेवानिवृत्त), प्रो. लाजर सी और डॉ. योगेश कुमार वेलारी भी शामिल थे।












