NATO ने सेना तैनाती की तैयारी की
अमेरिका और डेनमार्क दोनों NATO के सदस्य हैं। ऐसे में सदस्य देशों में टकराव से NATO में हड़कंप मच गया है। NATO ने अमेरिका को शांत करने के लिए वॉशिंगटन में लॉबिंग तेज कर दी है। वहीं, ब्रसेल्स में ग्रीनलैंड की सुरक्षा को मजबूत बनाने की योजना पर भी काम तेज किया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, NATO ने आर्कटिक पर खर्च बढ़ाने, वहां और ज्यादा सैनिक भेजने और कहीं ज्यादा संयुक्त अभ्यास शेड्यूल करने पर चर्चा की।
ट्रंप को क्या दिखाना चाहता है नाटो
इसका प्रमुख मकसद ट्रंप को यह दिखाना है कि ग्रीनलैंड और उसके आसपास का इलाका पहले की तरह पूरी तरह सुरक्षित है और यहां किसी अमेरिकी कब्जे की जरूरत नहीं है। इस प्रस्ताव पर दूसरे सदस्य देशों के दूतों ने व्यापक सहमति जताई। इसे यूरोपीय देशों की रणनीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। अभी तक NATO सदस्य देश ट्रंप के ग्रीनलैंड को हासिल करने या सेना के इस्तेमाल करने वाले बातों को भड़काऊ बयानबाजी मान रहे थे।
NATO के टूटने का खतरा बढ़ा
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के बाद हालात तेजी से बदल गए हैं। NATO देशों को लगने लगा है कि अमेरिका कभी भी ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए सैन्य अभियान छेड़ सकता है। इससे न सिर्फ NATO के टूटने का खतरा है, बल्कि यूरोप की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। इस कारण यूरोपीय यूनियन में कुछ देश अमेरिका के साथ सीधे टकराव की तैयारी भी कर रहे हैं। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने पहले कहा था कि ऐसा कदम NATO और दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने ट्रांसअटलांटिक सुरक्षा ढांचे का अंत होगा।
अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत क्यों है
ट्रंप ने जोर देकर कहा है कि क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी के बीच वाशिंगटन को ग्रीनलैंड की जरूरत है। ग्रीनलैंड में अमेरिका की पहले से ही सैन्य मौजूदगी है। ग्रीनलैंड के पिटुफिक बेस मे दूसरे विश्व युद्ध के समय से ही अमेरिकी सेना तैनात है। इस बर्फीले बेस पर लगभग 150 कर्मी स्थायी रूप से तैनात हैं, लेकिन शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड में 6,000 तक सैनिक तैनात किए थे। 1951 की एक संधि के तहत अमेरिका डेनमार्क को बस एक सूचना देकर अपनी सैन्य तैनाती को बढ़ा सकता है।














