बीजिंग के लिए, बलूचिस्तान कोई बाहरी जगह नहीं है, बल्कि पश्चिमी चीन को अरब सागर से जोड़ने वाला एक स्ट्रेटेजिक हिस्सा है। ग्वादर पोर्ट, जिसे अक्सर CPEC का क्राउन ज्वेल कहा जाता है, वो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के पश्चिमी किनारे को जोड़ते हुए छोटे एनर्जी और ट्रेड रूट देता है। अरबों डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी और माइनिंग प्रोजेक्ट्स में निवेश, प्रांत की स्थिरता से जुड़े हैं, जिसका मतलब है कि चीनी हितों के पास बार-बार होने वाले हमलों का असर पाकिस्तान के अंदरूनी सिक्योरिटी माहौल से कहीं ज्यादा होता है।
बलूचिस्तान में क्या चीनी प्रोजेक्ट्स के बंद होने का खतरा है
एशिया टाइम्स के मुताबिक चीन ने अभी तक बलूच हमलों को लेकर रणनीतिक सब्र दिखाया है। जिसमें आतंकवाद की सार्वजनिक निंदा के साथ पाकिस्तान को लगातार डिप्लोमैटिक सपोर्ट और बेहतर सिक्योरिटी सहयोग पर जोर दिया गया है। जनवरी में हमलों में बढ़ोतरी उस वक्त हुई है, जब पाकिस्तान की इकोनॉमी के लिए ये संवेदनशील समय है। पाकिस्तान, अपने ग्रोथ को स्थिर करना चाहता है, विदेशी निवेश लाना चाहता है और उन सेक्टर्स में मिनरल डेवलपमेंट को बढ़ाना चाहता है, जिनमें चीन और संभावित वेस्टर्न पार्टनर्स दोनों ने दिलचस्पी दिखाई है।
लेकिन बलूचिस्तान में लगातार हिंसा, सुरक्षा पर आने वाला खर्च, ऑपरेशनल अनिश्चितता और लंबे समय के लिए पॉलिटिकल रिस्क की सोच ने प्रोजेक्ट् को मुश्किल बना दिया है। बलूचिस्तान में चीन के कई प्रोजेक्ट हैं जो गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट इन्वेस्टमेंट, खासकर चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग से चल रहे हैं। ऐसे में हमलों का सीधा नुकसान चीन को होता है। बलूचिस्तान इसलिए भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ये ईरान और अफगानिस्तान से जुड़ता है। तीनों देश के विद्रोही अब हाथ मिला चुके हैं। इसीलिए अब ऐसा लग रहा है कि अपने प्रोजेक्ट्स की रक्षा के लिए चीन खुद सुरक्षा को अपने हाथों में सकता है। क्योंकि बलूचिस्तान के अस्थिर रहने का मतलब हिंद महासागर के मलक्का स्ट्रेट का विकल्प बनाने की चीन की कोशिशों को झटका लगता है।













