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  • जिस हिरोश‍िमा में गिरा था परमाणु बम, उसके वैज्ञानिकों ने स्‍मार्टफोन को बना दिया ‘रेडिएशन डिटेक्टर’, जानें कैसे काम करेगा?

    क्या आपने कभी सोचा है कि स्मार्टफोन से रेडिएशन का पता लगाया जा सकता है? जी हां, हिरोशिमा विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने एक ऐसा कम लागत वाला पोर्टेबल रेडिएशन डोसीमेट्री सिस्टम बनाया है, जो स्मार्टफोन को ऑन-साइट रेडिएशन डिटेक्टर में बदल देता है। इसका मतलब है कि डोसीमेट्री सिस्टम का इस्तेमाल करके स्मार्टफोन को रेडिएशन


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    By Azad Hind Desk जनवरी 29, 2026
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    क्या आपने कभी सोचा है कि स्मार्टफोन से रेडिएशन का पता लगाया जा सकता है? जी हां, हिरोशिमा विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने एक ऐसा कम लागत वाला पोर्टेबल रेडिएशन डोसीमेट्री सिस्टम बनाया है, जो स्मार्टफोन को ऑन-साइट रेडिएशन डिटेक्टर में बदल देता है। इसका मतलब है कि डोसीमेट्री सिस्टम का इस्तेमाल करके स्मार्टफोन को रेडिएशन डिटेक्टर के तौर पर उपयोग कर पाएंगे। सिस्टम परमाणु या रेडियोलॉजिकल घटनाओं के तुरंत बाद उसकी डोज यानी असर का पता लगाने में मदद करेगा। ये सिस्टम ऐसे समय में आया है, जब जापान बढ़ती ऊर्जा मांगों और जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा को फिर से अपना रहा है। बता दें कि अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा शहर पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिराया था और अब वहां के वैज्ञानिकों ने ही ऐसी खोज की है।

    कैमरे के साथ जोड़ा गया रेडियोक्रोमिक फिल्म का छोटा टुकड़ा

    रेडिएशन मेजरमेंट्स नाम के एक जर्नल में पोर्टेबल रेडिएशन डोसीमेट्री सिस्टम की डिटेल दी गई है। सिस्टम बनाने के लिए रेडियोक्रोमिक फिल्म के एक छोटे से टुकड़े को फोल्डेबल, बैटरी से चलने वाले स्कैनर और स्मार्टफोन कैमरे के साथ जोड़ता है। इसे इसलिए डिजाइन किया गया है ताकि यह ऐसी स्थिति में भी तुरंत नतीजे दे सके, जहां ट्रेडिशनल लैब बेस्ड तरीके बहुत धीमे, महंगे या पहुंच से बाहर हो सकते हैं।

    रिसर्चर का कहना है कि बड़े पैमाने पर परमाणु या रेडियोलॉजिकल घटनाओं के बाद रेडिएशन के संपर्क में आने के कारण होने वाले बुरे परिणामों से लोगों की रक्षा करने के लिए यह पता लगाना जरूरी है कि हर व्यक्ति पर हुए रेडिएशन का कितना असर हुआ है। हिरोशिमा विश्वविद्यालय के रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर रेडिएशन बायोलॉजी एंड मेडिसिन के प्रोफेसर और इस स्टडी के लेखक, हिरोशी यासुदा ने कहा कि गंभीर रेडियोलॉजिकल या परमाणु दुर्घटना की स्थिति में लोगों की रक्षा के लिए रेडिएशन का एक व्यक्ति पर होने वाला नुकसान और चिकित्सा कार्रवाई के लिए तुरंत जांच होना जरूरी है।

    रेडिएशन डिटेक्टर तकनीक

    स्मार्टफोन पर बेस्ड रेडिएशन डिटेक्टर तकनीक में गैफक्रोमिक EBT4 फिल्म खास है। जो विकिरण के संपर्क में आने पर तुरंत रंग बदलती है। रंग बदलना आंखों से आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन सिस्टम फिल्म को स्कैन करके और स्मार्टफोन से उसकी तस्वीर खींचकर विकिरण से कितना नुकसान है, यह मापने की सुविधा देता है। इसके बाद मोबाइल इमेज-प्रोसेसिंग एप्लिकेशन का उपयोग करके परिवर्तन का विश्लेषण करता है। रिसर्चर ने दिखाया कि इसका उपयोग करके डोज को 10 ग्रे तक मापा जा सकता है।

    ट्रेडिशनल डोसीमेट्री उपकरणों से है काफी सस्ता

    सैमसंग और आईफोन डिवाइसों सहित विभिन्न स्मार्टफोन मॉडल के साथ टेस्टिंग की गई। टीम ने पाया कि डिजिटल फोटो में सियान कलर ने लगातार और भरोसेमंद डोज-रिस्पॉन्स डेटा दिया। हालांकि, डेस्कटॉप स्कैनर अधिक सटीक बने हुए हैं। पूरे सिस्टम की लागत 70 अमेरिकी डॉलर (लगभग 6,423 रुपये) से कम है, जो इसे पारंपरिक डोसीमेट्री उपकरणों की तुलना में बहुत सस्ता बनाता है।

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