फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला गैर अरब मुल्क
बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने इजरायल के साथ अपने संबंधों को काफी मजबूत किया है। 2020 से 2024 के बीच भारत इजरायल का सबसे बड़ा हथियार आयातक बन गया और दोनों देशों का सालाना द्विपक्षीय व्यापार करीब 5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसके बावजूद, भारत ने फिलिस्तीनी मुद्दे पर अपना समर्थन जारी रखा है। 1975 में भारत पीएलओ (PLO) को फिलिस्तीनी लोगों के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना था। भारत रामल्ला में अपना प्रतिनिधि कार्यालय चलाता है, फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNRWA) को सालाना 50 लाख डॉलर की मदद देता है और हमेशा द्वि-राष्ट्र समाधान की वकालत करता रहा है। माना जा रहा है कि अब ट्रंप की यह नई पहल भारत की इस स्थापित कूटनीतिक नीति को पेचीदा बना सकती है।
ट्रंप पर भरोसेमंद नहीं, इजरायल-UAE से बात करनी पड़ेगी
डॉयचे वेले की रिपोर्ट के मुताबिक विदेश नीति के जानकार और राजनयिक इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि भारत को इस बोर्ड में शामिल होना चाहिए या नहीं। जेएनयू के सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर मुद्दस्सिर कमर का कहना है कि भारत को एक कूटनीतिक रस्सी पर चलना होगा। उन्होंने कहा कि ट्रंप जैसे एक अप्रत्याशित अमेरिकी राष्ट्रपति से निपटने की चुनौती और बोर्ड के ढांचे को लेकर स्पष्टता की कमी जैसे मुद्दों पर विचार करना जरूरी है। स्थायी सदस्यता के लिए कथित तौर पर 1 अरब डॉलर के योगदान की शर्त एक बड़ी बाधा हो सकती है। उनका मानना है कि भारत कोई भी फैसला लेने से पहले इजरायल और यूएई जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों से सलाह ले सकता है।
पीस बोर्ड में शामिल के पक्षधर क्या कह रहे हैं?
दूसरी ओर, सेवानिवृत्त राजनयिक और फिलिस्तीनी प्राधिकरण में भारत के पहले प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति की दलील है कि भारत को इसमें शामिल होना चाहिए क्योंकि बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी प्राप्त है। उन्होंने कहा कि चूंकि अमेरिका चाहता है कि जी-20 आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करे, इसलिए बीओपी जी-20 का एक भू-राजनीतिक समकक्ष बन सकता है। तिरुमूर्ति का मानना है कि भारत की उपस्थिति हमेशा तर्क और व्यावहारिकता की आवाज रही है और इस बोर्ड में शामिल होकर भारत ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील देशों की चिंताओं को मजबूती से रख सकेगा।
पीस बोर्ड की निष्पक्षता पर सवाल
हालांकि, जेएनयू की ही प्रोफेसर समीना हमीद इसके विपरीत राय रखती हैं। उनका मानना है कि कानूनी अस्पष्टता और उच्च राजनीतिक कीमत के कारण भारत का शामिल होना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया है, लेकिन हमास को इस पहल से पूरी तरह बाहर रखा गया है। हमीद ने चेतावनी दी कि बोर्ड का ढांचा अमेरिका को असीमित अधिकार देता है, जो इसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उनका सुझाव है कि भारत को रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखनी चाहिए, जैसा कि वह अपनी विदेश नीति की स्वायत्तता बचाने के लिए पहले भी करता आया है।
भारत को सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए
कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि भारत को सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए और शामिल होने से पहले शर्तों पर बातचीत करनी चाहिए। अगर बोर्ड का फोकस सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित रहता है, तो भारत अपनी शांति सेना की परंपरा के अनुरूप गाजा के लिए चिकित्सा सहायता जैसी भूमिका निभा सकता है।















