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  • डिएगो गार्सिया नेवल बेस और चागोस द्वीप क्या हैं? डोनाल्ड ट्रंप की अचानक भारत के पड़ोस पर क्‍यों पड़ी नजर, समझें प्‍लान

    वॉशिंगटन: ग्रीनलैंड पर हो-हल्ला मचाते डोनाल्ड ट्रंप अचानक से हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया बेस पर कूद गये। ये द्वीप चागोस द्वीप समूह का हिस्सा है, जिसपर अमेरिका-ब्रिटेन का सैन्य बेस है। इस द्वीप पर ब्रिटेन का नियंत्रण था, जो असल में मॉरीशस का क्षेत्र है। ब्रिटेन ने पिछले साल इस द्वीप को मॉरीशस


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    By Azad Hind Desk जनवरी 21, 2026
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    वॉशिंगटन: ग्रीनलैंड पर हो-हल्ला मचाते डोनाल्ड ट्रंप अचानक से हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया बेस पर कूद गये। ये द्वीप चागोस द्वीप समूह का हिस्सा है, जिसपर अमेरिका-ब्रिटेन का सैन्य बेस है। इस द्वीप पर ब्रिटेन का नियंत्रण था, जो असल में मॉरीशस का क्षेत्र है। ब्रिटेन ने पिछले साल इस द्वीप को मॉरीशस को सौंपने पर सहमति जता दी थी। इसको लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने निशाना साधा और ब्रिटेन के फैसले को ‘बेवकूफी से भरा फैसला’ कहा। उन्होंने कहा कि “हैरानी की बात है, हमारा ‘शानदार’ नाटो सहयोगी, यूनाइटेड किंगडम, वर्तमान में डिएगो गार्सिया द्वीप, जहां एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डा है, वो मॉरीशस को देने की योजना बना रहा है और ऐसा बिना किसी कारण के कर रहा है।” ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह फैसला “बहुत बड़ी बेवकूफी का काम” था।

    कई दशकों से ब्रिटेन ने हिंद महासागर में रणनीतिक द्वीपों की एक श्रृंखला, चागोस को अपने कंट्रोल में रखा। 1960 के दशक में ब्रिटेन ने इस द्वीप श्रृंखला के सबसे बड़े डिएगो गार्सिया पर अमेरिका के साथ मिलकर सैन्य अड्डा बनाने का प्लान तैयार किया और फिर द्वीपसमूह में 55 से ज्यादा द्वीपों के निवासियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया। पूर्वी अफ्रीका में स्थित मॉरीशस ने 1968 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से द्वीपों पर संप्रभुता का दावा किया है।

    ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच समझौता
    ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कीर स्टारमर की सरकार ने बढ़ते कानूनी और राजनयिक दबाव के तहत पिछले साल चागोस द्वीप समूह, जो अफ्रीका और इंडोनेशिया के बीच लगभग आधे रास्ते में हैं, उसे मॉरीशस को सौंपने पर अपनी सहमति दे दी। यह फैसला वर्षों की बातचीत और संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च अदालत, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के एक फैसले के बाद आया, जिसमें कहा गया था कि ब्रिटेन ने 1965 में द्वीपसमूह को मॉरीशस के नियंत्रण से अलग करके गैरकानूनी काम किया था। पिछले मई में, ब्रिटेन और मॉरीशस की सरकारों ने इस सौदे पर हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते की शर्तों के मुताबिक संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन 99 वर्षों की प्रारंभिक अवधि के लिए डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डे का संचालन जारी रखेंगे। और उसके बाद इसे मॉरीशस को सौंप देंगे।

    इस बेस का इस्तेमाल अमेरिकी नौसेना के जहाजों को सर्विस देने और लंबी दूरी के बॉम्बर में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अमेरिका का मानना था कि समुद्र में एक बेस होने से शीत युद्ध के चरम पर सोवियत संघ और चीन को दूर रखने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, डिएगो गार्सिया की लोकेशन इसे निगरानी और खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए एक अहम लिसनिंग पोस्ट बनाती है। यहां लगभग 4,000 अमेरिकी और ब्रिटिश सेना और नागरिक अधिकारी रहते हैं। चागोस को लेकर ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच औपचारिक बातचीत 2022 में शुरू हुई, जब लंदन में सरकार कंजर्वेटिव पार्टी की थी। बातचीत में तब तेजी आई जब अफ्रीकी देशों ने ब्रिटेन पर संप्रभुता सौंपने का दबाव डालना शुरू किया। कुछ लोगों ने कहा कि ये द्वीप ब्रिटेन की “अफ्रीका में आखिरी कॉलोनी” थे।

    ट्रंप के बयान पर मॉरीशस ने क्या कहा?
    मॉरीशस ने डिएगो गार्सिया पर ट्रंप के बयान पर जवाब देते हुए कहा कि “चागोस द्वीपसमूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय कानून पहले ही साफ तौर पर मान्यता दे चुका है और अब इस पर बहस नहीं होनी चाहिए। मॉरीशस के अटॉर्नी जनरल गैविन ग्लोवर ने कहा कि ट्रंप के यूके और मॉरीशस के बीच हुए डील को “बहुत बड़ी बेवकूफी” और “पूरी तरह से कमजोरी” बताने के बावजूद, उन्हें उम्मीद है कि यह समझौता आगे बढ़ेगा। मॉरीशस के ग्लोवर ने कहा कि यह “याद रखना ज़रूरी है” कि यह डील “सिर्फ यूनाइटेड किंगडम और मॉरीशस गणराज्य के बीच बातचीत करके, फाइनल करके और साइन की गई थी”।

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