क्या है सोर्स कोड और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
सोर्स कोड को आप किसी भी सॉफ्टवेयर या एप्लिकेशन की बुनियादी सक्रिप्ट समझ सकते हैं। सोर्स कोड को प्रोग्रामर्स Java, Python, या C++ जैसी प्रोग्रामिंग की भाषा में टेक्स्ट के रूप में लिखते हैं। इस आप आसान तौर पर एक पकवान की रेसिपी के तौर पर समझ सकते हैं। कोई फोन कैसे काम करेगा या उसका सॉफ्टवेयर कैसा दिखेगा ऐसी तमाम चीजें उसके सोर्स कोड पर निर्भर करती हैं। इसे आप फोन का दिमाग मान सकते हैं, जिससे तय होता है कि आपका डिवाइस कैसे काम करता है और उसमें मौजूद आपका डेटा कितना सुरक्षित है। यही वजह है कि तमाम स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियां अपने सोर्स कोड को एक सीक्रेट के तौर पर रखती हैं।
क्या है सोर्स कोड से जुड़ा विवाद?
भारत सरकार लोगों के डेटा की हिफाजत के लिए 83 नए सुरक्षा स्टैंडर्ड सेट करना चाहती है। इसमें से एक स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों से उनके सोर्स कोड की डिमांड करता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का कहना है कि देश में लोगों के साथ ऑनलाइन फ्रॉड और धोखाधड़ी के मामले इस कदर बढ़ गए हैं कि उन्हें इस पर रोक लगाने के लिए कंपनियों के सोर्स कोड की जरूरत है। हालांकि बाद में सरकार ने ऐसे किसी भी दावे को खारिज कर दिया था। बता दें कि सोर्स कोड की जांच करके उन कमियों को दूर किया जा सकता है, जो यूजर की प्राइवेसी को खतरे में डालती है। वहीं एक पक्ष है जो इसे कंपनियों और लोगों की प्राइवेसी के लिए सही नहीं मानता। स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों से इस तरह की मांग अमेरिका और चीन जैसे देश भी कर चुके हैं।
सोर्स कोड को लेकर कंपनियों को क्या है डर?
सोर्स कोड को किसी के साथ भी शेयर करना स्मार्टफोन कंपनियां अपने बिजनेस के लिए सही नहीं मानती हैं। उनका कहना है कि अगर उनका सोर्स कोड लीक हो जाए, तो उनके तमाम डिवाइसेज की सुरक्षा ठप हो जाएगी। कहने का मतलब है कि अगर कंपनियों के सोर्स कोड आसानी से उपलब्ध हों, तो हैकर्स कोड में किसी तरह की खामी को ढूंढ कर बड़े साइबर हमले को अंजाम दे सकते हैं। इसके अलावा उनकी प्रतिस्पर्धी कंपनियां भी उनके कोड को आसानी से कॉपी कर सकती हैं। साथ ही किसी को भी डिवाइस का इतना डीप एक्सेस देना यूजर्स की प्राइवेसी के लिए ठीक नहीं होता।
भविष्य में और बढ़ सकती है चुनौती
Azad Hind नजरिया: फिलहाल सरकार ने भले बयान देकर इस मुद्दे को शांत कर दिया हो लेकिन AI के दौर में यह विवाद और भी बढ़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि AI के ‘ब्लैक बॉक्स’ मॉडल्स का सोर्स कोड समझना काफी मुश्किल काम है। ऐसे में किसी न्यूट्रल थर्ड पार्टी से स्मार्टफोन कंपनियों के कोड की जांच कराई जा सकती है लेकिन चुनौती एक ऐसी व्यवस्था बनाने की होगी जिसमें यूजर्स की प्राइवेसी के साथ-साथ कंपनियों के इनोवेशन और उनके व्यापारिक अधिकारों की रक्षा की जा सके।














