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  • तमाम चुनौतियों से टकराते हुए यहां तक पहुंचा है संविधान, धर्म-जाति की राजनीति से है खतरा

    नई दिल्ली: अपने देश में आजकल संविधान पर खतरे की बात आक्रामक तरीके से उठाई जा रही है। ऐसे में यह याद करना महत्वपूर्ण है कि जहां भारत स्वाधीनता के ढाई वर्षों के अंदर गणतंत्र बन गया, वहीं साथ में आजाद हुआ पाकिस्तान 23 मार्च 1956 को गणतंत्र बना। यानी लगभग 9 साल वह डोमिनियन


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    By Azad Hind Desk फरवरी 7, 2026
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    नई दिल्ली: अपने देश में आजकल संविधान पर खतरे की बात आक्रामक तरीके से उठाई जा रही है। ऐसे में यह याद करना महत्वपूर्ण है कि जहां भारत स्वाधीनता के ढाई वर्षों के अंदर गणतंत्र बन गया, वहीं साथ में आजाद हुआ पाकिस्तान 23 मार्च 1956 को गणतंत्र बना। यानी लगभग 9 साल वह डोमिनियन बना रहा और आगे भी उसके लोकतंत्र का चीरहरण होता रहा। उस समय आजाद हुए कई मुल्कों का ऐसा हश्र हुआ। इसलिए यह भारत के लिए गर्व करने की बात है कि यहां का लोकतंत्र और संविधान तमाम उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए भी सुरक्षित है। ध्यान रहे, एक अध्ययन के अनुसार विभिन्न देशों में संविधान की औसत आयु नौ साल है।

    कसौटियों पर खरा: भारतीय संविधान की रचना के बारे में ग्रैंविल ऑस्टिन ने लिखा है कि 1787 में फिलाडेल्फिया में अमेरिकी संविधान बनाए जाने के बाद यह सबसे बड़ा राजनीतिक उद्यम है। उनके मुताबिक, किसी संविधान की परख यह है कि उन परिस्थितियों से निपटने में वह कितना सक्षम है, जिन्हें ध्यान में रखते हुए उसे बनाया गया। उन्होंने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद सत्ता का हस्तांतरण जितने शांतिपूर्ण तरीके से हुआ, उससे स्पष्ट है कि भारतीय संविधान सफल है।

    आलोचकों को जवाब: संविधान लागू होने के बाद प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री आइवर जेनिंग्स भारत आए। विभिन्न विश्वविद्यालयों में दिए अपने भाषणों में उन्होंने भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि यह अपने ही भार से टूटकर जल्द ही खत्म हो जाएगा। दिलचस्प है कि कुछ समय बाद सिलोन (वर्तमान श्रीलंका) ने उन्हें अपने देश का संविधान लिखने के लिए बुलाया और जो संविधान उन्होंने लिखा, वह छह साल में खत्म हो गया। भारतीय संविधान आज भी जीवंत है।

    हाइलाइट: सबक सीखें

    • विभिन्न देशों में संविधान की औसत आयु नौ साल
    • भारतीय संविधान की मजबूती अब स्वत:सिद्ध है
    • मिली-जुली सरकार संवैधानिक संस्थान के हित में

    जातिवाद की चुनौती: आज सांप्रदायिकता एवं जातिवाद को विचारधारात्मक स्तर पर समर्थन मिल रहा है। अब जातीय जनगणना होने जा रही है। राहुल गांधी ने इसके पक्ष में लंबा अभियान चलाया था। लेकिन इसी कांग्रेस पार्टी ने 1955 में नई दिल्ली में आयोजित पार्टी के 60वें सत्र में प्रस्ताव पारित किया था कि हर पृथकतावादी प्रवृत्ति को कुचलना होगा; जाति पृथकतावादी होने के साथ ही लोकतंत्र विरोधी भी है।

    नेहरू की चेतावनी: इससे पहले 16 जुलाई और 1 अगस्त 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को देश की एकता के विरुद्ध सक्रिय ताकतों के बारे में पत्र लिखा कि प्रांतीय भावना, सांप्रदायिक भावना, जातीय भावना, भाषाई भावना देश की एकता को तोड़ती हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1960 के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि इन भावनाओं को राष्ट्रीय भावना के अधीन होना चाहिए।

    SIR पर विवाद: अभी चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर गंभीर विवाद है। विपक्ष का आरोप है कि विरोधी दलों के समर्थकों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए SIR किया जा रहा है।‌ मामला शीर्ष अदालत के समक्ष भी लाया गया, लेकिन उसने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि पहचान के लिए कुछ अन्य दस्तावेजों को शामिल करने का निर्देश दिया। जाहिर है पुनरीक्षण तो होना ही चाहिए लेकिन निष्पक्ष तरीके से।

    ‘लिटिल प्रेग्नेंसी’: भ्रष्टाचार शुरू से देश के लिए बड़ी चुनौती रहा है। सितंबर 1946 में अंतरिम सरकार के गठन के बाद महात्मा गांधी को प्रतिदिन औसतन अस्सी चिट्ठियां भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर आती थीं। 1948 में ही जीप घोटाला हुआ, जिसमें ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वी के कृष्ण मेनन पर आरोप लगा था। भ्रष्टाचार के बारे में एक सांसद ने सवाल उठाया तो नेहरू ने कहा कि माननीय सदस्य को इधर-उधर के ‘लिटिल करप्शन’ की चर्चा नहीं करनी चाहिए। इस पर उन सांसद ने टिप्पणी की कि लिटिल करप्शन ‘लिटिल प्रेग्नेंसी’ की तरह है, जो समय के साथ बढ़ता जाएगा। यह भविष्यवाणी सच साबित हुई। भ्रष्टाचार आज सबसे बड़ी चुनौती है।

    एक दल की सरकार के खतरे: भारतीय लोकतंत्र का एक अनुभव यह भी रहा है कि मिली-जुली सरकार होने पर विकास थोड़ा बाधित होता है। लेकिन गौर करने की बात है कि इससे सांविधानिक संस्थान मजबूत हो जाते हैं। एक दल की सरकार, चाहे केंद्र में हो या राज्य में, अन्य संस्थाओं का सम्मान नहीं करती है। उससे कैबिनेट सिस्टम भी कमजोर होता है, केवल प्रधानमंत्री या मुख्य मंत्री की प्रधानता रह जाती है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

    (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार और सांविधानिक मामलों के जानकार हैं)

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