• National
  • दक्षिण में उम्मीद, पूर्व में चुनौती, 140 साल पुरानी कांग्रेस का 2026 में होगा कमबैक?

    नई दिल्ली: महात्मा गांधी ने एक ऐसे भविष्य की कल्पना की थी जहां स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस अपनी भूमिका पूरी कर एक लोक सेवक संघ में विलीन हो जाएगी और सत्ता की चाबी जनता के हाथों में सौंप देगी। लेकिन आजादी के बाद इतिहास ने गांधी की कल्पना के परे नाटकीय मोड़ लिया। 140 साल


    Azad Hind Desk अवतार
    By Azad Hind Desk जनवरी 2, 2026
    Views
    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement
    नई दिल्ली: महात्मा गांधी ने एक ऐसे भविष्य की कल्पना की थी जहां स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस अपनी भूमिका पूरी कर एक लोक सेवक संघ में विलीन हो जाएगी और सत्ता की चाबी जनता के हाथों में सौंप देगी। लेकिन आजादी के बाद इतिहास ने गांधी की कल्पना के परे नाटकीय मोड़ लिया। 140 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी, जो आजाद भारत से भी ज्यादा पुरानी है। अब भी चुनावी मैदान में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। कभी देश की राजनीति का केंद्र रही यह पार्टी अब अपनी पहचान खोती दिख रही है।

    1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधुनिक भारत के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन समय के साथ वह पार्टी, जो कभी राजनीति का केंद्र तय करती थी आज उसी केंद्र को खोजने में संघर्ष कर रही है। पार्टी के भले ही नारे बुलंद हों और प्रदर्शन लंबे, लेकिन अब दबदबे की जगह नुकसान की भरपाई और पुरानी यादें वोट दिलाने में नाकाम साबित हो रही हैं।

    2026 की अग्निपरीक्षा

    अपने 141वें वर्ष में प्रवेश कर रही कांग्रेस के पास आत्ममंथन के लिए वक्त कम और गलती की गुंजाइश उससे भी कम है। क्योंकि इस साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा है। विरोध की राजनीति को नया रूप देने से लेकर दक्षिण और पूर्वोत्तर में अहम लड़ाई लड़ने तक, यह पुरानी पार्टी एक बार फिर चौराहे पर खड़ी है। पांच राज्यों में होने वाले इन चुनावों के परिणामों के जरिए पार्टी के पास यह साबित करने का मौका है कि वह अपने पुराने अनुभव के दम पर कमबैक कर सकती है।

    कांग्रेस को अपने चुनावी नारे बदलने की जरूरत?

    “संविधान बचाओ”, “वोट चोरी”, “जातिगत जनगणना” जैसे नारों पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा। राहुल गांधी ने इसके लिए लंबी पदयात्राएं भी कीं। इन यात्राओं ने शायद लोगों को जोड़ा हो, लेकिन वोट कांग्रेस के खाते में नहीं आए। हालांकि, 2026 में कांग्रेस के चुनावी नारों में बदलाव देखने को मिल सकता है। पार्टी ने ग्रामीण रोजगार योजना – MGNREGA – को VB G-RAM-G कानून से बदलने के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है।

    CWC की बैठक में मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, कि पार्टी “MGNREGA से गांधीजी का नाम हटाने की साजिश” का विरोध करेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या योजना के लाभार्थी इस तर्क से जुड़ाव महसूस कर पाएंगे? पार्टी के विस्तृत आरोप जमीनी हकीकत से मेल खाएंगे या नहीं, यही बड़ी चुनौती है।

    कांग्रेस का दक्षिण और पूर्वोत्तर में दांव

    इस साल पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में केरल, असम और पुडुचेरी कांग्रेस के लिए अहम हैं। इन चुनावों में पार्टी सीधे तौर पर बीजेपी या वाम दलों का सामना करेगी। केरल में स्थानीय निकाय चुनावों में शानदार वापसी से कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा है। हालांकि, बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA की तिरुवनंतपुरम में जीत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    केरल

    स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस नीत UDF की जोरदार वापसी से पार्टी उत्साहित है। LDF के खिलाफ एंटी-इन्कंबेंसी साफ दिखी है। हालांकि त्रिवेंद्रम में NDA की जीत ने चेतावनी भी दी है कि मुकाबला अब सिर्फ द्विध्रुवीय नहीं रहा।

    असम

    2016 की हार के बाद कांग्रेस जमीनी राजनीति पर लौटने की कोशिश कर रही है। “रायजोर पोडुलित रायजोर कांग्रेस” अभियान, घोषणापत्र के लिए जनता से सुझाव और गठबंधन की राजनीति पर जोर दे रही है। इसके साथ ही असम में कांग्रेस उन मुद्दों पर जोर दे रही है, जिनकी वजह से वह सत्ता से बाहर हुई थी। बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस विपक्षी दलों का नेतृत्व भी कर रही है लेकिन 126 में से 100 सीटों पर लड़ने का फैसला गठबंधन में तनाव भी पैदा कर रहा है।

    तमिलनाडु

    कांग्रेस DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन में एक मुश्किल स्थिति में है। वह ज्यादा सीटों की मांग करके अपनी स्थिति सुधारना चाहती है, लेकिन राज्य में अपने कमजोर आधार और DMK के स्पष्ट दबदबे से उसे निपटना होगा। पार्टी की चुनौती यह है कि वह गठबंधन से अलग दिखे बिना अपना वोट बैंक तैयार करे। इसके साथ ही संतुलन बनाए रखना ही यहां सबसे बड़ी चुनौती है।

    पश्चिम बंगाल

    पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लगभग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। 2021 में खाता न खोल पाने के बाद पार्टी हाशिए पर है। TMC और BJP के बीच सीधी टक्कर में कांग्रेस की जगह सिकुड़ चुकी है और ममता बनर्जी के अकेले लड़ने के फैसले ने विकल्प भी बंद कर दिए हैं। बंगाल में कांग्रेस का कोई बड़ा नेता भी नहीं जो पार्टी के लिए जनाधार बटोर सके।

    राहुल बनाम प्रियंका?

    कांग्रेस के भीतर और आसपास से हालिया टिप्पणियों ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या पार्टी अनौपचारिक रूप से प्रियंका गांधी वाड्रा को एक बड़े नेतृत्व विकल्प के रूप में देख रही है। ओडिशा की पूर्व विधायक मोहम्मद मोक्विम का मल्लिकार्जुन खरगे की प्रभावशीलता पर सवाल उठाना और स्पष्ट रूप से उम्र और युवा पीढ़ी से जुड़ाव की कमी का उल्लेख करना, पार्टी के कुछ वर्गों के भीतर ठहराव और चुनावी दिशाहीनता के बारे में गहरी चिंता को दर्शाता है।

    प्रियंका के समर्थन में, इमरान मसूद द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश करने से लेकर रॉबर्ट वाड्रा द्वारा बढ़ती मांगों को स्वीकार करने तक, यह सुझाव देता है कि एक ऐसा वर्ग है जो उन्हें एक संभावित एकजुट करने वाली हस्ती के रूप में देखता है जो पार्टी को मतदाताओं से फिर से जोड़ सकती है।

    2025 का सबक

    2025 कांग्रेस के लिए “चलते रहने लेकिन न पहुंच पाने” का साल रहा। राहुल गांधी की 1300 किमी की बिहार यात्रा सुर्खियों में रही, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में पार्टी कमजोर पड़ी। झारखंड अपवाद रहा, जहां मजबूत सहयोगी और कल्याणकारी एजेंडे ने पार्टी को सहारा दिया।

    728 x 90 Advertisement
    728 x 90 Advertisement
    300 x 250 Advertisement

    हर महीने  ₹199 का सहयोग देकर आज़ाद हिन्द न्यूज़ को जीवंत रखें। जब हम आज़ाद हैं, तो हमारी आवाज़ भी मुक्त और बुलंद रहती है। साथी बनें और हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा दें। सदस्यता के लिए “Support Us” बटन पर क्लिक करें।

    Support us

    ये आर्टिकल आपको कैसा लगा ? क्या आप अपनी कोई प्रतिक्रिया देना चाहेंगे ? आपका सुझाव और प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।