छत्तीसगढ़ को मार्च तक नक्सल मुक्त करने की बात कही जा रही है। क्या रणनीतिक रूप से ऐसा हो सकता है या महज राजनीतिक लक्ष्य है?
हां, सरकार मार्च तक राज्य और देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य हासिल करने के काफी करीब है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवाद) के महासचिव बसवराजू सहित केंद्रीय कमिटी और दंडकारण्य स्पेशल जोन कमिटी के कई सदस्य पहले ही मुठभेड़ में ढेर हो चुके हैं। वेणुगोपाल ‘सोनू’, रूपेश, रामदेर, संग्राम और देवजी ने दलबल के साथ समर्पण किया है। पीपल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी की बटालियन-1 का कमांडर मांडवी हिडमा भी आंध्र प्रदेश में मारा गया। महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (MMC) स्पेशल जोन के सचिव कबीर सहित सभी माओवादियों ने भी समर्पण किया है। दक्षिण बस्तर के कुछ हिस्से को छोड़ दें तो बाकी इलाके काफी हद तक सशस्त्र संघर्ष से मुक्त हो चुके हैं। लक्ष्य पूरा करने के लिए केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार ने मिलकर नए सुरक्षा कैंप लगाए और बेहतर तालमेल से माओवाद विरोधी अभियानों में सफलता पाई।
क्या अब नक्सल आंदोलन कमजोर हो गया?
माओवाद आंदोलन 2012 से ही मुश्किल में है। 2010 में जिला महासमुंद पहुंचने के बाद इसका विस्तार रुक गया। उस साल ही माओवादियों की अंतिम PLGA कंपनी नंबर-10 का गठन हुआ। 2012 में माओवादियों ने दूसरी बटालियन बनाई, मगर 2014 में उसे कंपनियों में तब्दील करना पड़ा। इसके बाद सभी मिलिट्री फॉरमेशन में सदस्य कम पड़ने लगे। अगस्त 2024 में पार्टी के पोलित ब्यूरो ने बचाव का रास्ता खोजा, मगर सफल नहीं हुए। पिछले साल मई में बसवराजू के मारे जाने और अक्टूबर में वेणुगोपाल के समर्पण के बाद पार्टी का एक पक्ष शांति वार्ता चाहता था। दूसरी ओर, केंद्रीय कमिटी सदस्य देवजी का ग्रुप चाहता था कि संघर्ष जारी रहे। हालांकि उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया। लेकिन, इससे पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। इस साल फरवरी तक देश में माओवाद प्रभावित सिर्फ 7 जिले बचे हैं।
क्या अब भी नक्सलियों की भर्ती हो रही है?
दक्षिण बस्तर को छोड़कर बाकी क्षेत्र में माओवादियों की भर्ती समय के साथ कम होती गई। 2024 तक कुछ भर्तियां हुईं, लेकिन पिछले साल एक भी भर्ती नहीं हुई। माओवादी आंदोलन पीछे हो गया है और माओवादी भी सुरक्षित कार्यनीति अपना रहे हैं। अब तो उनकी गतिविधियां भी बंद हो गई हैं।
क्या सिर्फ सुरक्षा अभियानों से नक्सलवाद का खात्मा संभव है?
मैंने माओवाद प्रभावित इलाकों को तीन हिस्सों में बांटा है। सबसे पहले, अत्यधिक प्रभावित इलाका, जहां बगैर सुरक्षा के विकास कार्य संभव नहीं। दूसरा वह इलाका, जहां संघर्ष और विकास कार्य साथ-साथ चल सकते हैं। तीसरा वैसा इलाका जहां माओवाद पनप सकता है। इसलिए, अगर समय रहते वहां विकास कार्य किए गए, तो आंदोलन जोड़ नहीं पकड़ेगा। इसलिए प्रभावित इलाकों की स्थिति के अनुसार विकास कार्य करने चाहिए। जिन सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का फायदा माओवादियों ने उठाया, उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी सरकार की है।
ग्रामीण पुलिस के साथ हैं या डर में जी रहे?
केंद्र और राज्य सरकार की आत्मसमर्पण व पुनर्वास नीति काफी आकर्षक है। जिन्होंने समर्पण किया है, उन्हें फायदा मिल रहा। कई नौकरी चाह रहे हैं और कई की इच्छा गांव लौटने की है। ग्रामीण भी सरकारी कामकाज देख रहे हैं। जैसे-जैसे विकास कार्य बढ़ेंगे, ग्रामीणों का भरोसा बढ़ेगा। पहले आत्मसमर्पण करने वालों को गद्दार कह कर बदला लिया जाता था। अब स्थिति बदल गई है, इसलिए असुरक्षा की भावना कम हो गई है। लेकिन, जहां माओवादी गतिविधियां जारी है वहां अलर्ट रहना होगा।
खुफिया तंत्र कितना मजबूत हुआ, अब भी बाहरी फोर्स की दरकार है?
छत्तीसगढ़ में माओवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए विशेष सूचना शाखा खोली गई थी, जो काफी सुदृढ़ हुई है। इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य की विशेष सूचना शाखा समन्वय से काम कर रही है। टेक्निकल इंटेलिजेंस में भी सुधार आया। केंद्रीय बलों की 50 से ज्यादा बटालियन अभी छत्तीसगढ़ में हैं। छत्तीसगढ़ की भी 22 बटालियन हैं। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस बल 22-23 हजार से बढ़कर 80 हजार हो गया है। इसके अलावा, स्पेशल टास्क फोर्स और जिला रिजर्व गार्ड भी काफी प्रभावी रहा। लेकिन, बगैर केंद्रीय बलों के यह सफलता संभव नहीं थी।
मार्च तक अगर नक्सलवाद पूरी तरह खत्म नहीं होता, तो क्या यह असफलता होगी?
सुरक्षा बल मार्च तक लक्ष्य हासिल करने के नजदीक हैं। माओवादी अब सिर्फ दक्षिण पश्चिम बस्तर तक सीमित हैं। शीर्ष नेतृत्व के खात्मे से ये कमजोर हो गए हैं। सुरक्षा बलों का अभियान जारी है। अगर मार्च तक कुछ माओवादी बच जाते हैं, तो भी वे लंबी लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे। लेकिन, स्थिति पर नजर रखना जरूरी है।














